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डीकेएस में सिर्फ गड़बड़ियां, 350 बेड के अस्पताल में ट्रामा तक नहीं खोला

Dainik Bhaskar

Mar 16, 2019, 03:06 AM IST

Raipur News - भर्ती से लेकर मशीनों की खरीदी और आउटसोर्सिंग को लेकर चर्चा में आए डीकेएस सुपर स्पेश्यालिटी अस्पताल 370 बेड का है,...

Raipur News - chhattisgarh news only disturbances in the dks the 350 bed hospital did not open up to trauma
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भर्ती से लेकर मशीनों की खरीदी और आउटसोर्सिंग को लेकर चर्चा में आए डीकेएस सुपर स्पेश्यालिटी अस्पताल 370 बेड का है, लेकिन यहां ट्रामा सेंटर नहीं है। इसका नतीजा यह है कि अगर छोटी-बड़ी किसी भी तरह की चोट के लिए अगर कोई मरीज नजदीकी अस्पताल मानकर डीकेएस में चला गया तो वहां मरहम पट्टी भी नहीं होगी। बल्कि मरीज को वहां से अंबेडकर अस्पताल में ही भेजा जाएगा। गंभीर मरीज के लिए दिक्कत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि डीकेएस से अगर उसे अंबेडकर रिफर किया गया तो भारी ट्रैफिक दबाव की वजह से एंबुलेंस को 10 से 15 मिनट तो लग ही सकते हैं, जबकि दोनों अस्पतालों की दूरी महज पौन किमी है।

सड़क दुर्घटना में गंभीर मरीजों को दोहरी पीड़ा झेलनी पड़ रही है। सिर में गंभीर चोट है तो भी उन्हें अंबेडकर अस्पताल में भर्ती करना पड़ रहा है। क्योंकि 140 करोड़ के डीके अस्पताल में 20 बेड का ट्रामा सेंटर नहीं है। जरूरत हुई तो मरीजों को डीके रिफर करते हैं। बैठक में निर्णय लिया गया है कि ट्रामा के किसी भी मरीज को सीधे डीके में भर्ती नहीं किया जाएगा। इसके लिए आपातकालीन चिकित्सा अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए गए हैं। कई बार मरीज सीधे डीके पहुंच जाते हैं, उन्हें लौटा दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर कोई सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुआ है और सिर में चोट आई है तो उन्हें आधे से एक घंटे के बीच इलाज मिलना जरूरी है।



ऐसा नहीं होने पर मरीज की जान भी जा सकती है। अंबेडकर अस्पताल में ऑर्थोपीडिक विभाग के एचओडी डॉ. एसके फुलझेले के मुताबिक ट्रामा सेंटर के लिए हड्डी का डॉक्टर अनिवार्य है। डीके में इसकी नियुक्ति करने से मरीजों की सुविधा बढ़ सकती है। ट्रामा सेंटर में कॉल करने के बाद न्यूरो सर्जन मरीजों को देखने आते हैं।

आचार संहिता न लग जाए इसलिए किया लोकार्पण

प्रदेश के पहले सरकारी सुपर स्पेश्यालिटी दाऊ कल्याण सिंह डीकेएस अस्पताल को पिछले साल अक्टूबर में आनन-फानन में शुरू किया गया था। विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लग न जाए, इसलिए अधूरी तैयारियों के साथ दो अक्टूबर को लोकार्पण किया गया था। लोकार्पण के डेढ़ से दो महीने तक डीके में केवल ओपीडी में मरीजों का इलाज किया गया। मरीजों की भर्ती व सर्जरी अंबेडकर अस्पताल में होती रही। दिसंबर से डीके में मरीजों की भर्ती के साथ सर्जरी भी होने लगी। पिछले साल विधानसभा चुनाव के लिए आचार संहिता छह अक्टूबर को लगी थी। तब ऑपरेशन थिएटर को बैक्टीरियारहित भी नहीं किया गया था।

इसलिए सुपर स्पेश्यालिटी विभाग के डॉक्टरों को डीके में अोपीडी निपटाकर भर्ती मरीजों को देखने के लिए अंबेडकर अस्पताल जाना पड़ रहा था। सर्जरी भी पुराने ओटी में की जा रही थी।

डीके में न्यूरो सर्जरी व पीडियाट्रिक विभाग को छोड़ दिया जाए तो नेफ्रोलॉजी व प्लास्टिक सर्जरी विभाग एक से दो डॉक्टरों के भरोसे चल रहा है। वर्तमान में नेफ्रोलॉजी विभाग में कोई डॉक्टर नहीं है। किडनी के मरीजों का इलाज जनरल फिजिशियन कर रहा है। जबकि एमसीआई की गाइड लाइन के अनुसार यह अवैधानिक है। पिछले दो महीने से यह सिलसिला चल रहा है। अस्पताल प्रबंधन एक-दो नेफ्रोलॉजिस्ट से संपर्क किया है, लेकिन कोई कम वेतन में नौकरी ज्वाइन करने को तैयार है। एक निजी अस्पताल में कार्यरत नेफ्रोलॉजिस्ट को दो लाख महीना वेतन देने का आफर दिया गया, लेकिन उन्होंने ज्वाइन नहीं किया। हालांकि निजी प्रैक्टिस कर रहे कुछ नेफ्रोलॉजिस्ट ज्वाइन करने के लिए इच्छुक हैं। न्यूरो सर्जरी विभाग में चार, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग में तीन व प्लास्टिक सर्जरी विभाग में दो कंसल्टेंट डॉक्टर सेवाएं दे रहे हैं।

वेतन नहीं, डॉक्टर व स्टॉफ समेत 50 ने नौकरी छोड़ी

वेतन नहीं मिलने से डीकेएस के 50 से ज्यादा डॉक्टरों व स्टाफ नर्स ने नौकरी छोड़ दी है। डॉक्टरों में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट शामिल है। स्टाफ की कमी के कारण दिन व रात में वार्ड में भर्ती मरीजों के इलाज व देखभाल में परेशानी हो रही है। जो संविदा में स्टाफ बचा है, उन पर काम का दबाव बढ़ गया है। वे भी नियमित वेतन नहीं मिलने से नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं।

बिल्डिंग के लिए शासन से मांगा जाएगा फंड


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