सदर से चली काेड़े बरसाते हिरण्यकश्यप की झांकी बूढ़ापारा में नृसिंह का अवतरण, छाती चीर किया अंत

Raipur News - कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर सदरबाजार के गोपाल मंदिर से शुक्रवार शाम 5 बजे हिरण्यकश्यप की सवारी निकली। सवा घंटे...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:26 AM IST
Raipur News - chhattisgarh news the tableau of rainy season of hiranyakshyap was removed from the house the arrival of nrusinga in the old man the chest ripened end
कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर

सदरबाजार के गोपाल मंदिर से शुक्रवार शाम 5 बजे हिरण्यकश्यप की सवारी निकली। सवा घंटे जहां-तहां लोगों पर कोड़े बरसाते हिरण्यकश्यप की झांकी बूढ़ापारा पहुंची ही थी कि बूढ़ेश्वर मंदिर में नृसिंह का अवतरण हुआ। 15 मिनट मंदिर के सामने ही दोनों का जमकर युद्ध हुआ फिर ठीक 6.55 बजे मंदिर के दरवाजे के बीचों-बीच नृसिंह ने हिरण्यकश्प की छाती चीरकर उसका वध किया। इस घटना के गवाह बने शहर के हजारों लोग। दरअसल, शुक्रवार को नृसिंह जयंती पर रायपुर पुष्टिकर समाज ने हिरण्यकश्यप वध नाटक का आयोजन किया था। खास बात यह रही कि पूरे नाटक का मंचन शहर की सड़कों पर घूमते हुए किया गया। यानी सदरबाजार से बूढ़ापारा के बीच डेढ़ घंटे तक चले इस नाटक को हर किसी ने देखा भी और इसका लुत्फ भी उठाया। नाटक का सीन ऐसा था कि सदरबाजार से निकले हिरण्यकश्यप के साथ उसकी सेना भी चल रही थी। प्रतीकात्मक रूप से इधर-उधर उत्पात मचाते हुए वह बूढ़ापारा पहुंचा। हिरण्यकश्प के वध को जिस तरह कहानियों में बताया गया है उसी तरह नृसिंह अवतार का जन्म न दिन न रात यानी शाम को हुआ। खंभा फाड़कर भगवान ने अवतार लिया था, इसे दिखाने के लिए मंदिर में गत्ते का खंभा तैयार किया गया था। इसके अंदर से नृसिंह को अवतार लेते दिखाया गया। फिर प्रतीकात्मक रूप से नृसिंह को हिरण्यकश्यप का वध करते दिखा गया। नृसिंह अवतार का किरदार रमेश कुमार और हिरण्यकश्यप का किरदार राजकुमार व्यास ने निभाया। अधर्म पर धर्म की जीत के इस नाटक को तालियां बजाकर खूब सराहा भी। इसके बाद देर रात तक मंदिर में प्रसादी वितरण चलता रहा।

दूधाधारी मठ और ब्रह्मपुरी के विरंचीनारायण मंदिर में भी हुए कई धार्मिक अनुष्ठान

राजधानी में पुष्टिकर समाज की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा, हर साल आयोजन

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शहर की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा दावा- मुखौटे करीब सौ साल पुराने

नृसिंह जयंती पर पुष्टिकर समाज द्वारा शहर में हिरण्यकश्यप वध नाटक का मंचन करने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। पुष्टिकर समाज ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी देवकुमार व्यास बताते हैं कि नाटक में नृसिंह और हिरण्यकश्यप अवतार के लिए जिन मुखौटों का इस्तेमाल किया जाता है, वही करीब 100 साल पुराने हैं। सन् 1915-20 के आसपास मुल्तान (वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा) से लेकर आए थे। वहीं, बूढ़ेश्वर मंदिर का इतिहास साढ़े चार सौ साल पुराना है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि नृसिंह जयंती आयोजन का इतिहास मंदिर के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

नृसिंहनाथ मंदिर में रही मंत्रोच्चार की गूंज, शाम को निकली शोभायात्रा

ब्रह्मपुरी स्थित श्री विरंचीनारायण एवं नरसिंहनाथ मंदिर में शुक्रवार को धूमधाम से प्राकट्य उत्सव मनाया गया। भक्तों की मौजूदगी और महंत देवदास महाराज की अगवानी में सुबह 9 से साढ़े 11 बजे तक वेदी पूजा अौर दुग्धाभिषेक के दौरान मंत्रोच्चार की गूंज रही। इसके बाद पुरोहितों के द्वारा हवन अौर अारती की गई। मंदिर में प्राकट्य उत्सव के अवसर पर दोपहर 1.30 से शाम 4 बजे तक भंडारे का आयोजन किया गया। इसके बाद शाम 5 बजे बैंडबाजे और झांकी के साथ निकाली गई भव्य शोभायात्रा में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। लोग आराध्यदेव का जयघोष करते हुए मंदिर परिसर से निकले और कैलाशपुरी, पुरानीबस्ती से होते हुए बूढ़ेश्वर चौक पहुंचे।

दोपहर में भाेग-प्रसाद, 51 लीटर द्रव्य से किया भगवान का अभिषेक

इस मौके पर बूढ़ेश्वर मंदिर में भगवान नृसिंह का विशेष शृंगार किया गया था। दोपहर 12 बजे भोग-प्रसाद के बाद हवन-आरती की गई। इससे पहले सुबह 9 बजे 51 लीटर द्रव्य से भगवान का अभिषेक किया गया। नाटक के सारे पुराने सामान पुष्टिकर समाज की देखरेख में रखे गए हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि हिरण्यकश्यप के कोड़े से मार खाने वालों के पापों का क्षय होता है, ऐसी मान्यता है। बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे अनुष्ठानों में शामिल हुए। इस दौरान ट्रस्टी उमाशंकर व्यास, केके पुरोहित, रामनारायण व्यास, विनोद बोहरा, मनीष वोरा आदि मौजूद रहे।

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1. बूढ़ेश्वर मंदिर के सामने हिरण्यकश्यप वध नाटक को देखने के लिए जुटी भीड़।

2. अत्याचारी हिरण्यकश्यप और हरि के अवतार नृसिंह के बीच युद्ध का एक सीन।

दूधाधारी मंदिर में भी पूजा अभिषेक

मठपारा स्थित दूधाधारी मठ में भी नृसिंह प्राकट्योत्सव मनाया गया। राजेश्री महंत रामसुंदर दास ने कहा कि वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी पर नृसिंह प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। इसे नृसिंह चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस पावन बेला पर मंदिर परिसर में भगवान का दुग्धाभिषेक, पंचामृत और जलाभिषेक किया गया। इसके बाद विशेष शृंगार कर महाआरती की गई। भोग-भंडारे का आयोजन भी किया गया था जिसमें देर रात तक श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की।

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