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नासा के रेड जोन में कवर्धा : आग से बढ़ रहा है तापमान

ग्लोबल वार्मिंग में छत्तीसगढ़ और कवर्धा भी, फसल कटने के बाद लगाते हैं आग

Dainik Bhaskar

May 02, 2018, 02:23 PM IST
नासा की ओर से जारी की गई सेटेला नासा की ओर से जारी की गई सेटेला

- जीपीएस से तस्वीरें आई सामने, फरवरी से अप्रैल तक 189 जगह जला जंगल

- नासा द्वारा जारी की गई तस्वीर में रेड स्पॉट, इसमें कवर्धा भी शामिल है

कवर्धा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने देश में आग की भयावह तस्वीरें साझा की है। इस तस्वीर में लाल रंग के बिंदुओं के जरिए आग दिखाई गई है। यह रेड स्पॉट ज्यादातर मध्य भारत यानी मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में दिखाए गए हैं।

- लगभग यही स्थिति कबीरधाम यानी कि कवर्धा की भी है। यहां भी लाल निशान दिखाए गए हैं। जो बताते हैं कि यहां का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। जो ग्लोबल वार्मिंग का संकेत है। दरअसल, पिछले तीन महीने में जंगल में 189 स्थानों लगी भीषण आग और फसलों के हजारों एकड़ के अवशेष जलाए जाने के बाद सेटेलाइट ने कबीरधाम जिले को भी चिन्हित किया है।

- नासा की तस्वीर के मुताबिक कवर्धा के ज्यादातर हिस्से में आग की घटनाएं हुई हैं। कबीरधाम जिले में 21 हजार एकड़ से ज्यादा हिस्से में गन्ना और 75 हजार एकड़ से ज्यादा हिस्से में धान की फसल ली जाती है। फसल कटने के बाद इसी हिस्से में से ज्यादातर हिस्से को आग के हवाले कर दिया जाता है। कभी ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं हुई।

एनजीटी के निर्देश : अवशेष जलाने वालों पर फिर भी कार्रवाई नहीं
- लगभग डेढ़ साल साल पहले ही जनवरी 2017 में एनजीटी ने फसल काटने के बाद उसके अवशेष को जलाने वालों पर कार्रवाई के आदेश दिए थे। ऐसे किसानों से 2500 रुपए से लेकर 15 हजार रुपए तक फाइन वसूली की जानी थी।

- खेत में फसलों को काटे जाने के बाद उसके अवशेष को आग लगाई जा रही थी। इससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम हो रही थी। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ गया था। एनजीटी ने इसे रोकने के लिए कृषि विभाग को आदेश दिए थे।


21 हजार एकड़ में जलाए गन्नों के डंठल, 95% केसों में ऐसे निपटान
- कृषि विभाग के मुताबिक जिले में हर साल 21 हजार एकड़ खेतों में गन्ने के डंठल जला दिए जाते हैं। सबसे ज्यादा आग गन्ने के ठूंठ को ही लगाए जाते हैं। 95 प्रतिशत खेतों में गन्ना कटाई के बाद डंठल को आग के हवाले कर दिया जाता है। इससे मिट्टी के मित्र कीट मर जाते हैं। इसके अलावा मिट्टी में 17 तरह के पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर, जिंक, पोटाश, मैग्नीज, कोबाल्ट, कॉपर, कैल्शियम, बरना, मैग्निशियम, आयरन और सिलिकॉन भी घटने लगते हैं।


आईएआरआई की रिपोर्ट अवशेष जलाने में राज्य 13वें नंबर पर
- फसलों के अवशेष जलाने को लेकर इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई) ने एक रिपोर्ट भी जारी की। यह रिपोर्ट बताती है कि फसलों के अवशेष के मामले में छत्तीसगढ़ का स्थान देश में 13वां है और इसे जलाने के मामले में 17 वें स्थान पर है।

- प्रकृति विरूद्ध इस कार्य में कबीरधाम जिले का भी हाथ है। रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ में हर साल अनाज के अवशेष 8.87 मिलियन टन तक होते हैं। इसमें से हर साल 0.73 मिलियन टन अवशेष आग के हवाले कर दिए जाते हैं। इससे हर साल 11.11 लाख टन कार्बन डाइ ऑक्साइड, 1,830 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड समेत हवा में खतरनाक रसायन घोलने वाले दूसरे तत्व 9530 टन वायुमंडल में पहुंचते हैं।


प्रबंधन के लिए 2 लाख रुपए दिए
- हम किसानों को कृषि रथ के जरिए पोस्टर, बैनर्स, पंफ्लेट्स, लिफलैट्स व दृश्य-श्रव्य माध्यमों से फसल के अवशेष नहीं जलाने की जानकारी लगातार दे रहे हैं। अवशेष जलाने वालों हमने कोई कार्रवाई तो नहीं की है। लेकिन राष्ट्रीय कृषि विभाग योजना के जरिए 76 किसानों के खेतों में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए लगभग 2 लाख रुपए दिया गया है। - एनएल पांडे, डीडीए, कबीरधाम

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