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184 गांवों के लोग भगवान जगन्नाथ को 164 साल से देते आ रहे हैं लगान

नगर में 164 साल पहले पूर्वजों ने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का निर्माण शुरू करने के साथ ही मंदिर के संचालन के लिए लगान...

Danik Bhaskar | Jul 14, 2018, 02:30 AM IST
नगर में 164 साल पहले पूर्वजों ने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का निर्माण शुरू करने के साथ ही मंदिर के संचालन के लिए लगान देने की व्यवस्था बनाई थी। 184 गांव के लोगों के सहयोग से 47 साल बाद 1901 में मंदिर जब बन कर तैयार हुआ, तो जनसहयोग के प्रतीक के रूप शपथ शिला की स्थापना भी की गई। इसके साथ ही भगवान जगन्नाथ को लगान देने का संकल्प लिया गया था। लगान से मिले अन्न का एक भाग पुरी के जगन्नाथ को भोग लगने जाता है, इसी वजह से इस जगह का नाम देवभोग पड़ गया।

राजा महाराजा और जमींदारों के लगान लेने के किस्से तो सबने सुने हैं, लेकिन भगवान लगान वसूलते हैं, ऐसा कभी नहीं सुना होगा। जी हां देवभोग के इस ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर में विराजमान जगन्नाथ से जुड़ी यह आस्था भगवान और भक्तों को जोड़े रखी है। मंदिर में मौजूद रिकार्ड के मुताबिक 1820 में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति मीच्छो मूंड नामक ब्राह्मण पुरी से लेकर पहुंचा था। झराबहाल में बरगद पेड के नीचे रख की इसकी पूजा अर्चना किया करता था। लोगों की आस्था मूर्ति को लेकर बढ़ गई थी, लेकिन जमींदारों को मूर्ति की सत्यता परखने में 30 साल लग गए। जमींदारों ने देवभोग के ब्राह्मण पारा में मंदिर निर्माण के लिए 1854 में सहमति दी। इसके बाद इलाके के 184 गांव के ग्रामीणों ने श्रमदान से मंदिर का निर्माण पूरा किया। झराबहाल में पेड़ के नीचे जिस जगह पर पहले मूर्ति स्थापित थी, उसी जगह पर जनसहयोग के निर्माण के साक्ष्य के लिए शपथशिला स्थापना कर मंदिर संचालन के लिए भगवान को लगान देने का संकल्प लिया गया।

राधा-कृष्ण मंदिर से आज निकलेगी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा

सेल| राधा कृष्ण मंदिर से शनिवार को दोपहर 3 बजे श्री राधे-राधे समिति द्वारा भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाएगी। इसके पहले भगवान की पूजा की जाएगी। तत्पश्चात बलभद्र व सुभद्र सहित भगवान को रथ में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाएगा। इस मौके पर गजामूंग व चना का प्रसाद वितरित किया जाएगा। रथ यात्रा स्थल सरस्वती शिशु मंदिर के पास होगा। आयोजन समिति में महेश्वर प्रसाद साहू, गोविंद कुमार साहू, हेमलाल जायसवाल, कलेश्वर प्रसाद साहू, संजय कुमार जायसवाल, रितेश कुमार जायसवाल, अंकित साहू, आकाश साहू, घनश्याम प्रसाद आदि शामिल हैं।

पुरी की तर्ज पर होती है हर रस्म

पुरी की भांति रथयात्रा निकालने से पहले शुक्रवार को नेत्रोत्सव पर्व मनाया गया। लंबे समय से बीमारी से उठने के बाद मौसी के घर जाने से पहले प्रभु का श्रृंगार किया गया। पुरी में महाप्रभु के श्रृंगार करने वाले महाराणा के वंशज ही यहां भगवान का श्रृंगार करते हैं।

पुरी के पंडा निवास में हैं इस रिवाज के अभिलेख

जानकार बताते हैं 1901 के पहले तक इस जगह का नाम कोसूमभोग था मंदिर में लगान की व्यवस्था, फिर उसमें से पुरी के लिए जाने वाले भोग के रिवाज के बाद, पुरी से ही इस जगह का नामकरण देवभोग कर दिया गया। पुरी के दक्षिण द्वार में स्थित पंडा निवास में इसका अभिलेख मौजूद है। मंदिर समिति के अध्यक्ष देवेन्द्र बेहेरा ने बताया कि पहले की अपेक्षा प्रभु के नाम से लगान के रूप में आने वाले अनाज की मात्रा कम हुई है, लेकिन खरीफ सीजन के बाद धान, मूंग व अन्य दलहन तिलहन लगान के रूप में पहुंचती है। इसका एक तिहाई भाग पुरी के भगवान जगन्नाथ को भोग के लिए भेजा जाता है।