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38 लाख की नेकी दीवार, इतनी भी जगह नहीं कि दान के कपड़े, बुक और जूतों को भीगने से बचा पाएं

निगम ने 8 मई को इस नेकी की दीवार को शुरू किया। इसे बनाने को लेकर अफसरों कहना है कि 3 डिफरेंट जोन में यहां जरूरतमंदों...

Dainik Bhaskar

May 18, 2018, 03:45 AM IST
38 लाख की नेकी दीवार, इतनी भी जगह नहीं कि दान के कपड़े, बुक और जूतों को भीगने से बचा पाएं
निगम ने 8 मई को इस नेकी की दीवार को शुरू किया। इसे बनाने को लेकर अफसरों कहना है कि 3 डिफरेंट जोन में यहां जरूरतमंदों को अलग- अलग चीजें मिलेंगी। बुक ट्री से किताबों के साथ विशिंग वेल से उनकी हर इनोसेंट विश और कैंडी ट्री के जरिए लोगों को बर्थडे- सालगिरह जैसे खास दिनों को जरूरतमंदों के साथ सेलिब्रेट करने मोटिवेट किया जाएगा। नेकी की दीवार में विशिंग वेल यानी मन्नत पूरी करने वाला कुआं भी बनाया गया है, जिसमें लोग कचरा और चूड़ियां डाल रहे हैं। जहां सेल्फ बनाए गए हैं, वहां रखे सामान भी बारिश के पानी से भीग रहे हैं।

रायपुर | राजधानी में स्मार्ट सिटी के नाम पर कुछ ऐसे काम हो रहे हैं, जिनकी उपयोगिता पर अब सवाल उठने लगे हैं। हाल ही में अनुपम गार्डन के पास बनाई गई नेकी की दीवार को लेकर भी इसी तरह का देखा जा रहा है। 38 लाख रुपए खर्च कर बनाई गई इस दीवार का मुख्य उद्देश्य था कि यहां लोग अपने पुराने कपड़े, जूते और पुस्तक-कॉपी दान करें, जिससे कि वह किसी जरूरतमंद के काम आ पाए। लेकिन लाखों रुपए खर्च कर बनाई गई इस दीवार में इतनी भी जगह नहीं है कि दान में मिले कपड़े, जूते और किताबों को सुरक्षित रखा जा सके। गुरुवार को हुई बारिश में दान में मिले सामान भीग गए थे, जो बिखरे हुए थे। वहां न इन्हें रखने की जगह है न ही देखरेख की।

चमक-दमक पर जोर, सामानों को मवेशी और बारिश से बचाने के उपाय नहीं किए

नगर निगम की तरफ से पिछले कुछ माह के दौरान राजधानी को स्मार्ट सिटी बनाने की तर्ज पर सुंदरता और उपयोगिता के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर अलग-अलग निर्माण कराए जा रहे हैं। इनकी उपयोगिता कितनी कारगर है, इसे लेकर अब सवाल भी उठने लगे हैं। इसी कड़ी में जीई रोड अनुपम गार्डन के पास बने नेकी के दीवार में पिछले कुछ दिनों से शहर में लगातार शाम को हो रही बारिश के दौरान देखा गया कि यहां जो भी सामान लोगों ने जरूरतमंदों के लिए दान किए हैं, उसे रखने की जगह ही नहीं है। सजाने और सुंदर दिखाने के चक्कर में यहां किताब और सामानों को मवेशियों और बारिश से बचाने के लिए कुछ इंतजाम ही नहीं है। चार छोटे साइज के खुले स्पेस बनाए गए हैं, जिनमें भी बारिश का पानी आ जाता है। जबकि सिर्फ कुछ हजार रुपए खर्च कर वहां दराज या शीशे की आलमारी बनाई जा सकती थी।

तीन डिफरेंट जोन बनाए हैं, लेकिन रखने की जगह नहीं

ऐसी चौकसी कि हर दिन दान के कपड़े हो रहे हैं पार

भास्कर टीम ने लगातार तीन दिन तक इस नेकी की दीवार में दान दिए जाने वाले कपड़े और अन्य सामानों पर नजर रखी। यह पाया कि रात के दौरान करीब 11 व 11.30 बजे कुछ लोग, वहां आकर दिनभर दान में मिले कपड़े, जूतों को समेटकर अपने साथ ले जाते हैं। भास्कर टीम ने जब बुधवार की रात दो बड़े थैले में बांधकर कपड़ा ले जा रहे व्यक्ति से बात की तो वह कहने लगा कि कभी-कभी ले जाता हूं। घर में बच्चे हैं, उनके लिए। जबकि उसने थैले में 20 सेट से ज्यादा कपड़े रखे थे, जिनमें 2 साल के बच्चे से लेकर बड़ों तक के कपड़े और जूते थे। कुछ लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये दान में मिले सामान को अपने साथ हर दिन ले जाते हैं। इन कपड़ों को सेंकंड हैंड बाजार और कपड़े के बदले बर्तन ले लिया जाता है। वहां चौकीदार भी बैठाने की बात कही जा रही है, लेकिन वह मौके पर नहीं दिखाई देता है। आसपास के लोगों ने बताया कि इस तरह से हर रात को कपड़े ले जाने की जानकारी यहां के चौकीदार को भी है।

38 लाख की नेकी दीवार, इतनी भी जगह नहीं कि दान के कपड़े, बुक और जूतों को भीगने से बचा पाएं
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