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भास्कर एक्सक्लूसिव: 53 विभागों की कैश-बुक अब स्क्रीन पर, पाई-पाई का हिसाब आएगा नजर

सरकार का मानना है कि इस फुलप्रूफ सिस्टम से जनता का भरोसा सरकारी विभागों पर बढ़ेगा।

​जॉन राजेश पॉल | Last Modified - Jul 13, 2018, 05:58 AM IST

भास्कर एक्सक्लूसिव: 53 विभागों की कैश-बुक अब स्क्रीन पर, पाई-पाई का हिसाब आएगा नजर

रायपुर.राज्य सरकार बजट बनाने और उसे खर्च करने की पूरी प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसमें नए बजट के प्रस्ताव बनाने से लेकर विभागों को आबंटित की जाने वाली राशि और उसे व्यय करने का पूरा सिस्टम पारदर्शी बनाया जा रहा है। इस वजह से उसे ऑनलाइन किया जा रहा है। यहां तक की हर विभाग किस काम के लिए कितना खर्च कर रहा है इसका रोज का हिसाब भी स्क्रीन पर होगा। सरकार का मानना है कि इस फुलप्रूफ सिस्टम से जनता का भरोसा सरकारी विभागों पर बढ़ेगा। अब तक केवल, कर्नाटक, गुजरात, मध्यप्रदेश और ओडिशा में इसी से मिलते-जुलते सिस्टम लागू हैं।

प्रदेश में राज्य शासन के 53 विभाग काम कर रहे हैं। सब कुछ शासन की योजना के अनुरूप रहा तो इसी बजट से नया सिस्टम लागू हो जाएगा। इसके लिए कर्मचारियों को ट्रेंड करने का सिलसिला जुलाई अंत से शुरू हो जाएगा। मालूम हो कि नया बजट बनाने की प्रक्रिया सितंबर से ही शुरू कर दी जाती है। इसकी खास बात यह होगी कि किसी भी विभाग के अफसर को बजट प्रस्ताव बनाने के बाद इसे लेकर दौड़भाग नहीं करनी पड़ेगी। वह इसे तैयार करके वित्त विभाग को मेल कर देंगे। फिर बजट पर विभागवार होने वाली बैठक में इस पर केवल सहमति बनाने या अंतिम प्रकिया के लिए शामिल हो सकेंगे।

एक बार सिस्टम लागू होने पर एक समय में तीन साल के बजट का अवलोकन किया जा सकेगा। इसके आधार पर वित्त विभाग संबंधित विभाग के परफार्मेंस का आंकलन करने व उसकी जरूरतों के मुताबिक पैसा देने में आसानी होगी। कोई विभाग कितना रिवाइज बजट मांग रहा है ये पता लग सकेगा। एक और विशेष बात यह कि अभी बजट प्रस्तावों को लेकर कोई मिनिट्स तैयार नहीं किए जाते हैं, लेकिन ऑनलाइन डेटा रिकार्ड होने से इन्हें कभी देखा या खंगाला जा सकेगा।

बजट लैप्स होने से बचने के लिए वित्तीय वर्ष के अंत में फरवरी-मार्च में अंधाधुंध खर्च करने की परंपरा पर भी अंकुश लगेगा। वित्त विभाग बजट में राशि मांगने के बाद कोई विभाग उसका उपयोग नहीं कर रहा है, तो उसे ताकीद दी जा सकेगी। उसका असेस्मेंट किया जा सकेगा। अभी तो वित्तीय वर्ष खत्म होने पर पता चलता है कि अमुक विभाग ने पैसा का उपयोग किया, नहीं किया या गलत इस्तेमाल किया।

ये फायदे होंगे
- खर्च कम आएगा

- मेहनत कम लगेगी

- मेन पावर कम लगेगा

- बजट बनाने के वर्किंग आवर कम होंगे

- स्टेशनरी व्यय कम होगा

- प्रस्ताव के डेटा में गलती होने की संभावना कम होगी

- कहीं त्रुटि हुई तो सुधार की गुंजाइश के अवसर होंगे

- पारदर्शिता बढ़ेगी

एक ही खामी है, लेकिन बड़ी जरूरत है
जानकारों की मानें तो बजट और सरकारी विभागों में खर्च करने के तरीकों को फुलप्रूफ करने पर एक ही कमी मानी जा सकती है वो है कि पेपर में सारा-ब्लैक एंड वाइट पता लग जाएगा। इसमें एडिटिंग नहीं की जा सकेगी। बताते हैं कि ऑनलाइन सिस्टम शुरू करने की कोशिश तीन-चार साल पहले हो चुकी है। तब केवल ट्राइबल विभाग को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शामिल किया गया था। अब इसकी जरूरत इस वजह है कि साल-दर-साल राज्य के बजट का आकार बढ़ता जा रहा है। इस वजह से विभागों की सारी स्कीम, उन पर होने खर्च, प्लान-नान प्लान आदि की जानकारी एक क्लिक में न मिलने पर वित्त विभाग के अफसरों को बड़ी परेशानी होती है जब वे केंद्र सरकार या वित्त आयोग अथवा नीति आयोग की आपात बैठकें में जाते हैं।


अभी क्या प्रक्रिया है

अभी बजट के लिए प्रस्ताव मंगवाने की प्रकिया मैनुअली है। सभी 53 विभाग जिलों से प्रस्ताव मंगवाते हैं। इनमें 50-60 दिन लगते हैं। फिर इन्हें कंपाइल किया जाता है। लंबी कागजी प्रकिया से गुजरना होता है। डेटा इंट्री करने में तीन हफ्ते तक लग जाते हैं। फिर प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजे जाते हैं। यहां इनका विश्लेषण करने और पिछले बजट से तुलना करने में वक्त लगता है। फाइलें खंगालनी पड़ती है।

महालेखाकार का काम हलका होगा
बताते हैं कि महालेखाकार जब सरकार के वित्तीय कामकाज का लेखाजोखा पेश करता है तब वह सरकारी विभागों द्वारा किए जा रहे फिजूल खर्चों व आर्थिक अनियमितताओं को लेकर कड़ी टिप्पणी करता है। नया सिस्टम लागू होने से इस पर अंकुश लगने की उम्मीद है। इसकी वजह यह कि रोज-ब-रोज विभाग द्वारा खर्च की जाने वाली की मानिटरिंग की जा सकेगी। किसी एक मद के लिए मंजूर राशि का उपयोग किसी और काम के लिए खर्च नहीं किया जा सकेगा। कोई विभाग या दफ्तर फिजूलखर्ची करने की कोशिश करेगा तो तत्काल पकड़ में आ जाएगा। यदि किसी ने मेन डाटा छेड़खानी की तो भी ट्रेस हो जाएगा।

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