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रात 3 बजे प्रसव, कृत्रिम सांस की जरूरत पड़ी पर नहीं था वेंटिलेटर, डेढ़ घंटे में ही मौत

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 07:36 AM IST

Rajnandgaon News - मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामान्य प्रसव के बाद एक महिला की मौत हो गई। परिजन ने डॉक्टरों पर बेहतर देखभाल नहीं करने व...

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मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामान्य प्रसव के बाद एक महिला की मौत हो गई। परिजन ने डॉक्टरों पर बेहतर देखभाल नहीं करने व लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। इस पर डॉक्टरों का जवाब आया कि महिला की जान न बचा पाने का उन्हें भी अफसोस है।

भास्कर तह तक गया तो पता चला कि प्रसव के बाद महिला को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, कृत्रिम सांस देने की जरूरत थी, लेकिन मदर एंड चाइल्ड केयर यूनिट में वेंटिलेटर था ही नहीं। देखते-देखते महिला की सांस उखड़ गई। मोहड़ निवासी किरण पति संतोष साहू (25) को लेबर पेन के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मंगलवार तड़के करीब 3.03 बजे महिला का सामान्य प्रसव कराया गया। शिशु की हालत भी नाजुक थी। बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती किया गया। प्रसव के कुछ देर बाद महिला की तबियत बिगड़ गई, सांस नहीं लेने के कारण सुबह करीब 4.30 बजे उसकी मौत हो गई। मोहड़ में ही अंतिम क्रिया हुई।

प्रसुता किरण

मासूम हुआ अनाथ : उसकी हालत भी गंभीर, रिफर किया

राजनांदगांव. प्रसूता की मौत के बाद मोहड़ में बिलखते परिजन व पड़ोसी।

सालभर भी नहीं हुआ था संतोष-किरण की शादी को

संतोष और किरण की शादी 30 अप्रैल 2018 को हुई थी। विवाह को सालभर भी पूरे नहीं हुए थे। महिला के मौत के बाद परिवार में गम का माहौल है। चिंता इस बात की है कि मां के गुजर जाने के बाद दुधमुंहे बच्चे की देखभाल कौन करेगा। फिलहाल बच्चा एसएनसीयू में हैं। बच्चे की गंभीर तबियत देख उसे रिफर किया गया है।

पति बोला-ब्लड की कमी बताई तो व्यवस्था में जुट गए थे

पति संतोष साहू ने बताया कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डॉक्टरों ने प|ी के इलाज में लापरवाही बरती। डॉक्टरों ने प्रसव से पूर्व प|ी का चेकअप नहीं करवाया अन्यथा जान बच सकती थी। गंभीर हालत के बीच हमें बताया गया कि शरीर में ब्लड की कमी है, हम आनन-फानन में व्यवस्था करने में जुड़ गए लेकिन उसकी जान बच ना सकी।

भास्कर तत्काल: तीन महीने पहले मांगा, नहीं मिला

मामले में भास्कर ने पड़ताल की। इससे जो जानकारियां मिली वह चौंकाने वाली हैं। मदर एंड चाइल्ड केयर यूनिट प्रोजेक्टर नेशनल हेल्थ मिशन का है। लेकिन संचालन मेडिकल कॉलेज कर रहा है। यूनिट में गायनिक और चाइल्ड यूनिट मिलाकर 84 स्टाफ के पद स्वीकृत हैं। इसमें विशेषज्ञ डॉक्टर, डिप्लोमा डॉक्टर, उपकरणों के संचालन के लिए तकनीकी विशेषज्ञ, नर्स आदि शामिल हैं लेकिन अब भर्ती नहीं की गई। तत्कालीन कलेक्टर भीम सिंह व सचिव से चर्चा की गई। लेकिन सरकार बदलने के बाद सब ठंडा पड़ गया। गायनिक वेंटिलेटर और जरूरी उपकरणों के सप्लाई के लिए संचालनालय को पत्र लिखा पर पूर्ति नहीं हुई।

एचओडी बोलीं-ऐसे 75% केस में जान का जोखिम

गायनिक की एचओडी डॉ. मीना आरमो की मानें तो गर्भ में जो तरल पदार्थ होता है, उसमें बबल्स बनते हैं, ये बबल्स सांस नली या फिर शरीर के अन्य हिस्सों में जाम हो जाते हैं। इसे मेडिकल लैंग्वेज में परमोनेरी इमोलाइजेशन कहते हैं। ऐसे 75 फीसदी मामलों में जान बचा पाना मुश्किल होता है। उन्होंने जान बचाने की पूरी कोशिश की।

700 प्रसव महीने में, डेढ़ साल में ऐसे तीन मामले हुए

मेडिकल कॉलेज अस्पताल में महीने में करीब 700 प्रसव कराए जाते हैं। राजनांदगांव के ज्यादातर स्वास्थ्य केंद्र में सीजर केसेस हैंडल नहीं किए जा रहे हैं। प्रसूता की जिस तरह से मौत हुई, ऐसे मेडिकल में डेढ़ साल में तीन केस आ चुके हैं। ऐसे मामले रिफर करना पड़ते हैं। इधर अस्पताल में स्टाफ कम है। पांच डॉक्टर रात्रिकालीन ड्यूटी कर रहे हैं। गायनिक विभाग के डॉक्टर इस्तीफा दे रहे हैं। डॉ. साक्षी ठाकुर ने हाल ही में इस्तीफा दिया है। यदि यही हाल रहा तो मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीजों को सही उपचार मिल पाने दिक्कत होगी।

  डॉ. मीना आरमो, एचओडी, गायनिक डिपार्टमेंट

गायनिक वेंटिलेटर नहीं


- महिला को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, ऐसे केसेस में जान बच पाना मुश्किल होता है।


- गायनिक वेंटिलेटर नहीं है, शॉर्ट टाइम में व्यवस्था मुश्किल था।


- हमने डिमांड के लिए पत्र लिखा है, सप्लाई नहीं हो पाई है।


- पर्याप्त स्टाफ की कमी है, हम फिर भी बेहतर इलाज मुहैया कराने का प्रयास कर रहे हैं। शासन को चाहिए कि वे स्टाफ की पूर्ति करे।

मैं ड्यूटी पर थी


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