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आईपीएल शुरू होते ही फिर सक्रिय हो गए शहर के बड़े खाइवाल, पुलिस छोटे लोगों को पकड़ पाती है

शहर की पहचान पहले कांसे के बर्तन, ज्वेलरी और लाख से हुआ करती थी, अब इसकी पहचान सट्टा से होने लगी है। आईपीएल शुरू होते...

Danik Bhaskar

Apr 09, 2018, 04:35 AM IST
शहर की पहचान पहले कांसे के बर्तन, ज्वेलरी और लाख से हुआ करती थी, अब इसकी पहचान सट्टा से होने लगी है। आईपीएल शुरू होते ही फिर शहर में खाइवाल सक्रिय हो गए हैं। दिखाने के लिए पुलिस व क्राइम ब्रांच की टीम कार्रवाई भी करती है, पर उन बड़े नामों के सामने आने के बाद भी उन तक पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाते जो वास्तव में शहर में सट्टा के किंग माने जाते हैं। उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस को अपनी रणनीति बदलनी चाहिए।

सट्टा पर वैसे तो रोज ही लाखों रुपए दांव पर लगाए जाते हैं, लेकिन क्रिकेट पर सबसे अधिक दांव लगाए जाते हैं अब आईपीएल शुरू हो गया है तो एसपी के खौफ से कुछ दिनों तक छुपे रहने के बाद बड़े खाईवालों का नेटवर्क फिर से शुरू हो गया है। ऐसे लोगों ने लगभग 200 सिम फर्जी नाम से निकालकर उनके लिए काम करने वाले एजेंटों को दे दिये है। इन खाइवालों का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है, बड़े खाईवाल अपने घर से ऐसे लोगों पर नजर रखते हैं, घर के अलावा लक्जरी वाहनों में बैठकर मोबाइल से सट्टा लिख रहे है। पुलिस कार्रवाई करती है, यह कार्रवाई भी बड़े खाईवालों के इशारे पर होती है, जब भी पुलिस को प्रकरण बनाना होता है, पुलिस के कुछ कर्मचारी बड़े सटोरियों से संपर्क कर पहले ही यह पूछ लेते हैं कि कार्रवाई किसके खिलाफ की जाए। यही कारण है कि पकड़े गए छोटे खाईवालों के लेपटॉप एवं मोबाइल से बड़े खाइवाल का नाम सामने आने के बावजूद पुलिस उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती।

सट्टा से बिखर रहा परिवार

क्रिकेट सट्टे से शहर के युवा, महिलाएं, बुजुर्ग बहुत ज्यादा प्रभावित होते है कई परिवार तो सट्टा में बर्बाद हो गया है। घर द्वार बेचकर कमाने खाने छत्तीसगढ़ से अन्यत्र चले गये हैं। कुछ वर्ष पहले एक रेडियो व्यवसायी सट्टा के चक्कर में अपना दिमागी संतुलन खो दिया था। एक खाइवाल ने अपने नाम नहीं बताने पर बताया कि एक समय था कि सक्ती ज्वेलर्स व्यवसाय करने वालों की गिनती धनाढ्यों में होती थी अब छोटे से छोटे खाइवाल करोडो की संपत्ति बनाकर बैठा हुआ है ।

फर्जी सिम बेचने का चल रहा धंधा

जिन सटोरियों ने आईपीएल शुरू होेने से पहले बेहिसाब सिम फर्जी नामों से खरीदे हैं सिम बेचने वालों की दुकानों की भी जांच की जाए तो यह पता चल जाएगा कि सिम किन किन लोगों ने खरीदे। वे लोग ऐसे सिम का उपयोग कुछ निर्धारित समय के लिए ही करते हैं इसके बाद उस सिम को फेंक देते हैं। ऐसे में हर साल सैकड़ों नंबर को चालू करने एवं बंद करने का कारोबार भी धड़ल्ले से जारी है। कार्रवाई नहीं होने से इस पर भी रोक नहीं लग पा रही है।

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