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रक्शा का टीला जांच का विषय जो हडि्डयों जैसा नजर आता है

रक्शा पहाड़ का पुरातात्विक महत्व है जो इसके नाम से पता चलता है। इस पहाड़ में एक बरसाती झरना है। इसके ठीक बाजू में एक...

Bhaskar News Network| Last Modified - Mar 12, 2018, 02:55 AM IST

रक्शा का टीला जांच का विषय जो हडि्डयों जैसा नजर आता है
रक्शा का टीला जांच का विषय जो हडि्डयों जैसा नजर आता है
रक्शा पहाड़ का पुरातात्विक महत्व है जो इसके नाम से पता चलता है। इस पहाड़ में एक बरसाती झरना है। इसके ठीक बाजू में एक विशालकाय जीवाश्म जिसे हड्डियों का पहाड़ भी कहा जा सकता है स्थित है। पूरे पहाड़ी क्षेत्र में एकमात्र यही टीला है जो कि हड्डियों सा नजर आता है, जिसे गांव के लोग किंवदंतियों के चलते राक्षस की हड्डी मानते है, वहीं कुछ इसका आकार देखकर डायनासोर की हड्डी कहते हैं।

छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित यह रक्शा पहाड़ जिसे राक्षसों से रक्षा के नाम पर प्रचलित हो गया है। उपसरपंच रूसबो बरिहा का कहना है रक्शा पहाड़ के नीचे जो रक्शा डुढ़ा (गड्ढा) है। उसकी गहराई 10-15 फीट है। इसे लेकर प्रचलित प्रसंग के अनुसार इस जगह में पांडवों में से एक भीम मछली मारकर अपनी भोजन की व्यवस्था करते थे। मगर जब मारकर रखने के बाद जब स्नान कर लौटते थे तो इस बीच मे उसे कोई राक्षस उसे उठा ले जाता था। भीम ने उसे जब पकड़ा और पहाड़ से नीचे फेंक देने से उसकी मौत हो गई। 5 हजार साल बाद भी गांववालों के अनुसार अवशेष हड्डी के रूप मे आज भी पड़े है।

स्वास्थ्य कर्मचारी रहे जेआर निर्मलकर बताते हैं 20 साल पहले जब उस हड्डी को जलाकर देखा गया तो उससे बदबू आ रही थी। दूसरी जो बात प्रचलित है कि ऊपर पहाड़ी से डायनासोर गिर कर मर गया होगा, जो जीवाश्म के रूप में परिवर्तित हो गया। अवशेष वजन में सामान्य पत्थरों से हल्के हैं और आसपास बिखर रहे हैं।

डायनासोर इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि हाथी से यह कई गुना बड़ा नजर आता है। इसमें दीमक लगने के कारण यह घुन लगी लकड़ी की तरह भी दिखता है। पहाड़ के उस पार होने के कारण यह ओडिशा के मलाई खमन घेस क्षेत्र मे आता है।

रक्शा पहाड़ी के एक टीले की आकृति हड्डीनुमा।

वीडियो भेजकर विशेषज्ञों से मांगा मार्गदर्शन

यह हड्डीनुमा पहाड़ जांच का विषय है। पर्यावरण इको क्लब के मास्टर ट्रेनर व पैकिन स्कूल के प्राचार्य प्रभात कुमार भोई ने बताया कि इस जगह का वीडियो बनाकर पर्यावरण अध्ययन केंद्र, सीईई केंद्र रायपुर और पुणे को भेजकर विशेषज्ञों से मार्गदर्शन मांगा गया है।

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