अंग्रेजी खत्म कर सभी पाठ्यक्रम हिंदी में होना चाहिए: साहित्यकार ‘रसिक’

Ambikapur News - शिकायत नहीं है न कोई गिला है, जमाने से कायम यही सिलसिला है... गीत के रचनाकार हैं जाने-माने साहित्यकार रामप्यारे...

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 06:26 AM IST
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शिकायत नहीं है न कोई गिला है, जमाने से कायम यही सिलसिला है... गीत के रचनाकार हैं जाने-माने साहित्यकार रामप्यारे रसिक। जो कि सरगुजा की साहित्यिक धरा पर अपनी रचनाओं से लोगों की दिलों में राज रहे।

लेकिन विभिन्न रचनाओं के साथ ही रामायण को सरगुजिहा में लिखने वाले साहित्यकार राम प्यारे “रसिक’’ बदलते दौर में अपनी ही गलियों में गुम हो गए हैं। शहर के महामाया रोड की तंग गलियों में उनके घर तक पहुंचने के लिए भटकना पड़ा। एक बुजुर्ग मिले तो उन्होंने सामने वाली गली की ओर इशारा करते हुए बताया कि वहीं रहते हैं रसिक जी। खपरैल का छोटा सा मकान। हालत ऐसी है कि लंबे कद का आदमी बिना सिर झुकाए अंदर नहीं जा सकता। हम पहुंचे तो “रसिक’’ जी गमछा और कुर्ता पहने सोशल मीडिया पर रचनाएं शेयर कर रहे थे। दो हजार से अधिक सोशल मीडिया पर उनके मित्र हैं जो उनकी रचना को लाइक करते हैं। 86 साल के उम्र में भी रसिक अभी भी नियमित कविताएं, गीत और गजल लिख रहे हैं। हिन्दी दिवस पर उनसे पूछा कि हिन्दी को बढ़ाने के लिए क्या होना चाहिए? इस पर उन्होंने कहा कि अंग्रेजी को खत्म कर सारे पाठ्यक्रम हिन्दी में होने चाहिए। प्रसिद्ध कवि नीरज, कैफ भोपाली, कलीम भोपाली के करीबी रहे हैं।

कलाम-ए-रसिक का नहीं हो पा रहा प्रकाशन

“रसिक’’ जी अपनी नई पुस्तक कलाम-ए-रसिक के प्रकाशन के तैयारी में जुटे हैं लेकिन आर्थिक तंगी से प्रकाशन रुका है। 15 हजार रुपए प्रकाशक ने मांगे हैं। “रसिक” कहते हैं कि इस पुस्तक का प्रकाशन हो जाता तो ठीक होता। उनकी 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी लिखी रचनाएं छत्तीसगढ़ स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं तो रामायण को उन्होंने सरगुजिहा में लिखा है जो काफी प्रचलित है।

साहित्यकार का कोई भविष्य नहीं, पेंशन भी नहीं मिल रही

86वर्षीय “रसिक’’ कहते हैं कि साहित्यकार का कोई भविष्य नहीं है। उन्हें वृद्धा पेंशन के लायक भी नहीं समझा गया। नगर निगम में आवेदन दिया था, चक्कर लगाकर थक गया लेकिन पेंशन नहीं मिली। रसिक का साहित्य से प्रेम ही था कि सरकारी नौकरी छोड़ इसी में अपना पूरा जीवन बिता दिया। रसिक अपने बेटे के साथ इस मकान में रहते हैं। बेटे का छोटा सा प्रिंटिंग प्रेस है। कभी रसिक इसी से अखबार निकाला करते थे। उनके बेटे प्रदीप बताते हैं कि बाबूजी इस उम्र में भी हारे नहीं है और रोज कविताएं और गजल लिख रहे हैं।

लोगों को कभी रहता था नगर कल्लोल का इंतजार

युवा साहित्यकार केके त्रिपाठी बताते हैं कि साहित्यकार रामप्यारे “रसिक’’ के अंदर का रचनाकार पहले की ही तरह सजग और चौकस है। उनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं हैं। इनमें सरगुजा की आंचलिक आभा प्रमुखता से उभर कर आती है। अधिकांश रचनाएं सरगुजिहा बोली में हैं किंतु छंद और व्याकरण पर पकड़ अद्भुत है। छंदसिद्ध कवि ‘’रसिक’’ ने ढेरों दोहे कहे. सामयिकी घटनाक्रमों पर कटाक्ष करती उनकी व्यंग काव्य श्रृंखला ‘’नगर कल्लोल’’ का कभी लोगों को इंतजार रहता था।

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