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हर साल 65 सौ यूनिट खून की खपत, फिर भी ब्लड बैंक में कम्पोनेंट सेपरेटर नहीं, इससे एक यूनिट से कई मरीजों को लाभ

एक वर्ष पहले
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मेडिकल काॅलेज अस्पताल के ब्लड बैंक से मरीजों के लिए कम्पोनेंट सेपरेटर की जरूरतें बढ़ रही है, लेकिन प्रबंधन सभी तैयारी के बाद भी उपकरण की कमी के कारण इसे पूरा नहीं कर पा रहा है। इसके चक्कर में सबसे ज्यादा वैसे मरीज परेशान हो रहे हैं, जिन्हें प्लेटलेट्स व प्लाज्मा की जरूरत पड़ रही है।

इससे थैलेसीमिया व सिकलिंग वाले मरीज को आरबीसी की जगह सभी तत्वों के साथ ब्लड चढ़ाना पड़ रहा है। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि यदि यहां कम्पोनेंट सेपरेटर रहता तो इससे ऐसे मरीजों को सिर्फ आरबीसी चढ़ाया जाता बाकी के तत्व दूसरे मरीजों के काम आ जाता है। यह स्थिति तब है जबकि हर साल मरीजों को औसत 65 सौ यूनिट से अधिक से ब्लड दिया जाता है जिसमें से ज्यादा थैलेसीमिया व सिकलिंग के मरीज होते हैं। उपकरण का मामला कहां अटका है यह कोई नहीं बता पा रहा है। जबकि इसके लिए लाइसेंस भी अस्पताल के ब्लड बैंक को मिल गया है। उपकरण पर करीब 50 लाख का खर्च होने की संभावना है।

उपकरण भेजने लिखा गया है पत्र

डाॅ. आरके सिंह, डीन, मेडिकल काॅलेज, अंबिकापुर

खून में शामिल तत्वों को मशीन करती है अलग

एक यूनिट ब्लड (350 एमएल) में लगभग 50 प्रतिशत आरबीसी हाेती है। बाकी के 50 प्रतिशत में प्लाज्मा व अन्य तत्व होते हैं। ब्लड सेपरेटर यूनिट खून के इन तत्वों के अलग कर देती हैं। यह मशीन लाल रक्त कणिकाएं(आरबीसी), श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी), प्लेटलेट्स, प्लाज्मा, फ्रेश फ्रोजन प्लाजमा (एफएफपी) को अलग अलग कर देती है। ऐसे में मरीज को पूरी बोतल खून चढ़ाने के बजाए आवश्यक तत्व ही चढ़ाए जाते हैं। पैथालॉजी विशेषज्ञों के अनुसार थैलेसीमिया के मरीजों को आरबीसी, डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स, बर्न के मरीजों को प्लाजमा व एफएफपी व एड्स के मरीजों को डब्ल्यूबीसी की जरूरत पड़ती है।

मरीज प्राइवेट से महंगे में खरीदते हैं

मेडिकल काॅलेज अस्पताल के ब्लड बैंक में सेपरेटर यूनिट नहीं होने से मरीज पूरी तरह से प्राइवेट ब्लड बैंक पर निर्भर है। इसके लिए ऐसे केंद्रों में प्लेटलेट्स के लिए मनमानी कीमत ली जाती है। बताया जाता है कि एक यूनिट प्लेटलेट्स करीब चार से 5 हजार में दिया जाता है। इसका एक कारण भी है। प्लेटलेट्स ब्लड डोनेशन के छह घंटे के भीतर अलग किया जाता है। इसके बाद इसे अलग नहीं किया जा सकता है।

मेडिकल काॅलेज बनने और ब्लड यूनिट बढ़ने पर मिली थी मंजूरी


मेडिकल काॅलेज के नार्म्स के अनुसार ब्लड बैंक में कम्पोनेंट सेपरेटर होना जरूरी है। इसके साथ ही यहां प्रतिवर्ष ब्लड की खपत भी 65 सौ यूनिट से ज्यादा हो गई है। क्योंकि काॅलेज के अस्पताल में हर विभाग के मरीज भर्ती होते हैं और उन्हें इलाज के दौरान डाॅक्टर ब्लड के अलावा, इसमें समाहित तत्वों को अलग से देने सलाह देते हैं। इसी को लेकर ब्लड बैंक का विस्तार कर दो साल साल पहले कम्पोनेंट सेपरेटर के लिए चार कमरे का भवन बनाया गया है। जिसके लिए मंजूरी मिली थी।

{ उपकरण खरीदने में 50 लाख का है खर्च


{हर महीने 550 यूनिट ब्लड की हो रही खपत

{ब्लड बैंक में 300 यूनिट ब्लड की है क्षमता

प्लेटलेट्स, प्लाज्मा सहित अन्य तत्व की जरूरत पड़ने पर प्राइवेट ब्लड बैंक की मरीजों को लेने पड़ती है मदद

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