सरकार बन गई कर्जदार आरटीई कोटे के बच्चों की बकाया फीस दो करोड़ रुपए से भी ज्यादा हुई

Balod News - शिक्षा के अधिकार के तहत निजी स्कूलों में बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने के लिए 25% सीट आरक्षित किए जाते हैं। स्कूलों को...

Jan 16, 2020, 06:35 AM IST
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शिक्षा के अधिकार के तहत निजी स्कूलों में बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने के लिए 25% सीट आरक्षित किए जाते हैं। स्कूलों को मान्यता देने के लिए अब आरटीई का पालन भी जरूरी है। लेकिन सरकार बच्चों को पढ़ाने के बदले में निजी स्कूलों को पैसा नहीं दे पा रही है। बालोद जिले में दो करोड़ से ज्यादा का बकाया है। हाल ऐसा है कि 2 सत्र का पैसा भी अब तक पूरा नहीं आ पाया है। अभी सत्र 2017- 18 का पैसा मिल रहा है। 2018-19 और 2019-20 का तो अब तक कुछ पता नहीं है। विभाग के रिकॉर्ड अनुसार 1 साल में आरटीई पर जिले में एक करोड़ 70 लाख रुपए खर्च हुआ है। पिछले साल बच्चों की संख्या भी बढ़ी है। इससे दो करोड़ रुपए बकाया है। सरकार निजी स्कूलों की कर्जदार हो चुकी है तो दूसरी ओर पैसा नहीं मिलने से स्कूल संचालन में आ रही दिक्कतों को देखते अब संचालक बच्चों को प्रवेश देने से भी कतराने लगे हैं। नए सत्र में 1 मार्च से एडमिशन की प्रक्रिया शुरू हो रही है। लेकिन संचालकों को इस बात की चिंता है कि अगर पुराना पैसा ही नहीं मिला तो हम आगे बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे?

बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने 2 साल से फीस नहीं दे पा रही सरकार हालत ऐसी कि इस बार आरटीई में भर्ती लेने से भी कतरा रहे संचालक

केंद्र व राज्य शासन दोनों मिलकर करते हैं संचालन

दरअसल में शिक्षा के अधिकार की योजना केंद्र शासन की है। लेकिन इसका संचालन केंद्र और राज्य दोनों मिलकर करती है। छत्तीसगढ़ में हालत यह है कि पिछले 2 साल से केंद्र सरकार से इसके संचालन के लिए फंड नहीं मिल रहा है। अकेले राज्य सरकार इसका वहन कर रही है। इस वजह से भी समय पर स्कूलों को फंड जारी नहीं हो पा रहा है।

मांग के बाद मुश्किल से मिला था 32 लाख

2 साल से फंड नहीं मिलने के कारण तीन से चार बार निजी स्कूल संघ के पदाधिकारी रायपुर तक गए थे। जिसके बाद बमुश्किल जिले को 32 लाख रुपए का फंड मिला। जबकि यहां एक करोड़ 70 लाख रुपए से ज्यादा की जरूरत रहती है। कई ऐसे स्कूल है जहां अब तक 2 साल में एक रुपए नहीं आया। लापरवाही ऐसी है कि इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे।

निजी स्कूलों में पढ़ाने का ख्वाब रह जाएगा अधूरा

अगर योजना का सही तरीके से संचालन नहीं हुआ तो गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने का ख्वाब अधूरा रह जाएगा। जिले में आने वाले सत्र के लिए भी 1900 सीट ऐसे बच्चों के लिए आरक्षित हैं। 167 निजी स्कूलों में उन्हें प्रवेश दिलाना है। बिना फंड के संचालक हाथ खड़े कर रहे हैं। इनका कहना है कि आखिर हमें भी अपने स्टाफ को पेमेंट देना रहता है।

जानिए, एक बच्चे पर कितना होता है खर्च?

प्राइमरी और प्री प्राइमरी (नर्सरी) स्कूल में प्रति छात्र 7000 रुपए शिक्षण शुल्क, पुस्तक के लिए 250 रुपए, स्कूल ड्रेस के लिए 540.52 रुपए सरकार देती है। इसी तरह मिडिल स्कूल में 11400 रुपए शिक्षण शुल्क, 450 रुपए पुस्तक का और ड्रेस के लिए 540.52 रुपए देती है। लेकिन राशि नहीं मिलने से निजी स्कूल संचालकों की हालत खराब है।

आप भी जानिए, क्या कह रहे स्कूल संचालक ?

केंद्र से नहीं आ रहा फंड: रायपुर के डीपीएम अशोक कुलदीप कहना है केंद्र सरकार से फिलहाल आरटीई के तहत फंड नहीं आ रहा है। जो भी फंड है वह राज्य सरकार ही वहन कर रही है। साल में दो किस्तों में फंड जारी होता है। केंद्र से मदद नहीं मिलने के कारण भी कम फंड जारी हो रहा है।

ऐसे में पढ़ा नहीं पाएंगे: निजी स्कूल संचालक संघ के अध्यक्ष कमलकांत साव का कहना है कि 2017-18 का फंड ले देकर अभी मिल रहा है। 2018- 19 का अब तक आया ही नहीं है। स्थिति यह है कि फंड की कमी के कारण हम दो माह से स्टाफ का वेतन तक नहीं दे पा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो अगले सत्र में हम आरटीई से बच्चों को पढ़ा नहीं पाएंगे।

2017-18 का आया है फंड: आरटीई के जिला प्रभारी नरेंद्र भंसारे का कहना है कि अभी 2017-18 का बकाया फंड आया है। जिले में पिछले सत्र में देखें तो साल भर में 1 करोड़ 70 लाख रु. आरटीई पर खर्चा हुआ है। पिछले सत्र का फंड भी नहीं आया है। स्कूल संचालक विभाग में पता करने आ रहे हैं।

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