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फागुन मेला: उपहार देकर देवी-देवताओं के विग्रहों को दी गई विदाई, पौधे भी बांटे
10 दिनों की तमाम रस्मों के बाद ऐतिहासिक फागुन मड़ई का समापन गुरुवार को हुआ। फागुन मेला में 802 देवी-देवताओं के छत्र, विग्रह शामिल हुए। बुधवार को छत्र, ध्वज के साथ शहर में परिक्रमा हुई व मेला लगा। ढोल की थाप, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर ग्रामीणों ने पारंपरिक नृत्य किया। विधि-विधान के साथ पूजा हुई। गुरुवार को उपहार भेंट कर देवी- देवताओं के विदाई की रस्म अदा की गई। एक मार्च से शहर में फागुन मड़ई की छटा बिखरी हुई थी। इस बार फागुन मेले में शामिल होने पहुंचे ग्रामीणों को विदाई के दौरान उपहार में पौधे भी भेंट किए गए। यह पहली बार हुआ, जब नारियल, साड़ी व शगुन के 51 रुपए के साथ 3000 पौधे बांटे गए। इस दौरान मंदिर के जिया, पुजारी, सेवादार, विधायक देवती कर्मा, कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा सहित ग्रामीण मौजूद रहे।
फागुन मेले में शामिल हुए देवी-देवताओं के छत्र, विग्रह।
भटपाल में हुआ देवी-देवताओं के विग्रहों का मिलन समारोह
दंतेवाड़ा. छत्र, ध्वज के साथ ग्रामीणों ने शहर में परिक्रमा की।
बारसूर के हितामेटा में भी 3 दिनों तक मेला लगा। होली के दूसरे दिन बुधवार को करसाड़ मेला का आयोजन हुआ। इससे पहले सभी देवी-देवताओं के विग्रहों का मिलन समारोह भटपाल में हुआ। हितामेटा मेले में शामिल होने दंतेवाड़ा, फरसपाल ,बस्तर, कोंडागांव, भानपुरी व ओडिशा से भी ग्रामीण पहुंचे। सभी ने नृत्य किया।