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जीते-जी ही नहीं, मरने के बाद भी किसी काम आना चाहते हैं, इसलिए अंगदान की घोषणा
चितरंजन ने कहा- दूसरों की मदद से बड़ा कोई धर्म नहीं
नशामुक्ति के लिए भी लोगों को करते हैं जागरूक
लोगों के घर-घर जाकर उन्हें नशे से दूर रहने का संदेश देने के साथ इससे शरीर को होने वाले नुकसान और परिवार की कलह जैसी बुराइयां भी बताते हैं। जो नशा छोड़ना चाहता है उसकी हर तरह से आर्थिक मदद से लेकर अस्पताल तक का खर्च उठाते हैं। चितरंजन ने कहा कि दूसरों की मदद से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसे ध्यान में रखते हुए हम पती- प|ी यह काम कर रहे हैं।
कोंडागांव. चितरंजन खोब्रागडे एवं उनकी प|ी प्रीति खोब्रागडे।
कोंडागांव| शहर के प्रतिष्ठित दंपती 52 वर्षीय चितरंजन खोब्रागडे एवं उनकी प|ी 48 वर्षीय प्रीति खोब्रागडे ने मिलकर मानवता की मिसाल शहरवासियों के समक्ष प्रस्तुत की। उन्होंने इतना बड़ा दान कर दिया कि लोग अब उनकी समाजसेवा के इस कदम की सराहना करते हुए नहीं थक रहे हैं। खोब्रागडे ने एक बार अखबार में खबर पढ़ी कि मानव अंग पाने के लिए किसी परिवार को बहुत कठिनाइयां उठानी पड़ी। उन्होंने तभी ठान लिया कि वे अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को दान करेंगे। उन्होंने अगले दिन ही इसके बारे में पता लगाया और वेबसाइट पर जाकर अंगदान की पूरी प्रक्रिया जानी। जब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में शिविर आयोजित हुआ वहां जाकर अपने शरीर के हृदय, किडनी, लीवर, आंखें सहित सभी महत्वपूर्ण अंग दान करने की घोषणा की।
दम्पती का मानना है कि ऐसा करने से मरने के बाद भी वे इस दुनिया में रहेंगे और दूसरों को जिंदगी दे जाएंगे। जल संसाधन के एसडीओ चितरंजन खोब्रागडे और उसकी प|ी ने अपने सारे अंग दान करने की घोषणा कर दी है। इस दंपती का कहना है कि किसी जरूरतमंद को अपने अंग देकर मरने के बाद भी हम जीना चाहते हैं। इससे हमारी आंखों से हम दुनिया देख पाएं। हमारा दिल किसी को जीवन देकर मरने के बाद भी धड़के, इसी सोच के साथ अपनी मौत के बाद शरीर के सभी अंग दान देने की घोषणा कर दी है।