जीवन में आनंद चाहिए तो करते रहें अपना काम

Durg Bhilai News - जगतगुरु कृपालु मराहाज की शिष्या गोपिकेश्वरी देवी ने कहा कि जीवन में आनंद पाने के लिए कर्म करना अनिवार्य है। जीव भी...

Bhaskar News Network

Jan 14, 2019, 02:17 AM IST
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जगतगुरु कृपालु मराहाज की शिष्या गोपिकेश्वरी देवी ने कहा कि जीवन में आनंद पाने के लिए कर्म करना अनिवार्य है। जीव भी प्रत्येक कर्म सिर्फ सुख और आनंद पाने के लिए ही करना चाहता है। चाहे वह हंसे या फिर रोए, सोए या फिर जागे, इसमें सुख पाने की लालसा रहती है।

चींटी से लेक ब्रह्म तक सभी आनंद पाने के लिए कर्म कर रहे हैं। यह जीवन के लिए बहुत जरूरी है। कोई भी व्यक्ति दुख कभी नहीं चाहता। सेक्टर-5 दुर्गा मंच पर 23 जनवरी तक चलने वाली प्रवचन शृंखला में कहा कि विश्व के प्रत्येक जीव आस्तिक व नास्तिक हैं।

बताई बातें : प्रवचन शृंखला में सभी के कर्म करने के उद्देश्य की दी गई जानकारियां

बिना किसी उद्देश्य और लक्ष्य के कोई भी व्यक्ति किसी भी काम को नहीं करते

उन्होंने समझाया कि विश्व में ऐसा कोई भी जीव नहीं है जो बिना किसी उद्देश्य के कर्म करता हो। मनुष्यों में चाहे सामान्य व्यक्ति हो या फिर पागल वह भी कर्म करता है। हम विचार करें कि कर्म का उद्देश्य क्या है? तो हम जानेंगे कि हर जीव एक ही उद्देश्य को लेकर प्रत्येक कर्म करता है। इसका उद्देश्य सुख और आनंद पाना है। हंसना, रोना, नाचना, गाना, श्रम, आराम, भोजन, भजन आदि सभी आनंद पाने के लिए किया गया काम ही है। कोई भी एक क्षण को अकर्मा नहीं रह सकता। कर्म करते ही रहेंगे।

गोपिकेश्वरी देवी

मनुष्य हो या फिर जीव-जंतु, जड़ और चेतन सभी अपने मूल से करते हैं प्यार

हम सभी का मूल भगवान ही हैं। सभी जीव उनसे ही उत्पन्न हुए हैं। एक सिद्धांत है कि प्रत्येक अंश का अपने मूल से स्वाभाविक प्यार होता है। जैसे मिट्टी का ढेला ऊपर से छोड़ने पर सदैव पृथ्वी पर गिरता है। आग की लपटें हमेशा ऊपर की ओर उठती हैं। नदियां सदैव समुद्र की ओर बहती हैं। मिट्टी पृथ्वी का, अग्नि सूर्य का और नदियों का जल समुद्र का अंश है। अतः इन्हें अपने-अपने मूल रूप से प्यार है। ऐसे ही प्रत्येक जीव भगवान का सनातन अंश हैं, इसलिए वह आनंद ही चाहता है। आनंद यानी भगवान, तो हम येन-केन भगवान को ही चाह रहे हैं। इस तरह सभी आनंद की चाह में दौड़ रहे हैं। अपने मूल स्वरूप को ओर आगे बढ़ रहे हैं। यही सभी की मूल प्रकृति है।

वेदों के अध्ययन से ही भगवान को जान सकेंगे

सिद्धांतत: आस्तिक वही है जो भगवान को जान ले, पा ले। भगवान को सांसारिक व्यक्ति नहीं जान सकते। अगर सांसारिक व्यक्ति से भगवान को जानना चाहेंगे तो अंधा अंधे को राह दिखाए वाली स्थिति होगी। वेद सबसे बड़ी अथॉरिटी है। वेद से भगवान को जाना जाएगा। वेद ने कहा कि उस भगवान को कोई नहीं जान सकता। केनोपनिषद कहता है जो जानना चाहता है वह नासमझ है। पुनः जब जाना ही नहीं जा सकता तो फिर मान भी नहीं सकते।

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