साधना करनी है तो मां की तरह कीजिए जो बच्चे का पालन-पोषण बिना स्वार्थ करती है : विजयराज

Bhilai News - चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में नवकार भवन ऋषभ नगर में आचार्य विजयराज मसा ने कहा कि साधना हमेशा निष्काम भाव से करनी...

Aug 14, 2019, 08:45 AM IST
चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में नवकार भवन ऋषभ नगर में आचार्य विजयराज मसा ने कहा कि साधना हमेशा निष्काम भाव से करनी चाहिए। साधना में फल की चाह रखने से अविश्वास पैदा होेता है। इससे साधना कमजोर पड़ती जाती है। साधना के लिए भाव सदा एक मां की तरह निष्काम होना चाहिए।

एक मां अपनी संतान की सेवा, देख-रेख, भरण पोषण वात्सल्य भाव से करती है। उसके बदले वह कभी प्रतिफल की नहीं सोचती। ठीक उसी तरह फल की चाह रखे बिना साधना होनी चाहिए। आचार्य ने कहा फल की इच्छा से की गई साधना धर्म-कर्म के प्रति संदेह उत्पन्न करती है। ऐसी साधना या तो अधूरी रह जाती है या फिर निष्फल हो जाती है। गीता में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए उपदेश का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आचार्य ने कहा कि कर्म करना अपने अधिकार में है, लेकिन फल का मिलना न मिलना अपने वश में नहीं होता। इसी तरह यदि फल की ओर नजर रहेगी तो साधना से ध्यान भटकेगा।

स्पर्धा: जैन समाज की महिलाओं बच्चों ने हाथों से तैयार की राखी

आनंद मधुकर रतन भवन में राखी बनाओ प्रतियोगिता कराई गई।

आनंद मधुकर रतन भवन, बांधातालाब दुर्ग में मंगलवार दोपहर धर्मसभा के बाद बच्चों व महिलाओं के लिए राखी बनाओ और राखी सजाओ प्रतियोगिता का आयोजन साध्वी डॉ. अर्पिता श्रीजी के मार्गदर्शन में हुआ। इसमें महिलाओं ने एक से बढ़कर एक कलात्मक राखियां बनाकर और सजाकर सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किए। बच्चों ने भी अपनी कल्पना से रंग-बिरंगी राखियां बनाई। 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और रक्षा बंधन के पर्व पर इन राखियों को प्रदर्शित किया जाएगा। आनंद मधुकर रतन भवन में इस दिन भाई बहनों का जोड़े से जाप होगा। इस अनुष्ठान में श्रमण संघ परिवार ने सभी भाई-बहनें हिस्सा लेंगे। इससे पहले धर्मसभा में साध्वी र| ज्योति ने कहा कि मनुष्य का जीवन रेलगाड़ी की तरह है। सुख-दुख की पटरी पर जीवन की रेल चलती है। मनुष्य की तीन अवस्था हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा। बचपन खेलकूद में बीत जाता है। इस ओर ध्यान देना चाहिए।

संबंधों की यात्रा ही जीवन में दुख का कारण: विमर्श

इस जगत में सारे जीव संबंधों की यात्रा अनादि काल से करते आ रहे हैं। जिस भी पर्याय में जाते हैं उसमें नए-नए संबंध बनाते हैं और फिर उन संबंधों में सुख की खोज करते हैं। सुख की खोज करते-करते जीवन का अंत हो जाता है पर कहीं सुख नहीं मिल पाता। पुनः पर्याय से विदा लेकर अन्य पर्याय में पहुंचता है, फिर पुनः संबंधों का ताना-बाना बुनता है फिर उसमें सुख खोजना शुरू करता है।

इसी प्रकार का यह जन्म से मृत्यु के बीच सुख का अन्वेषण सतत् चलता रहता है। जीव चारों गतियों में परिभ्रमण करता हुआ दुख ही दुख प्राप्त करता रहता है। सुख की चाह में दुख को गले लगाते अनंतकाल व्यतीत हो गया पर आज तक सुख नहीं मिला। यह बातें भावलिंगी संत विमर्श सागर मुनि ने खंडेलवाल दिगंबर जैन भवन में धर्मसभा के दौरान कहीं। आचार्य ने कहा कि संसार में प्रत्येक जीवात्मा सुख चाहता है, दुख से बचना चाहता है और यथासंभव दुख मुक्ति के सारे उपाय भी करता है। फिर दुखों की परंपरा से छूट नहीं पाता, कारण क्या है? कारण है - हमने आज-तक दुख का वास्तविक स्वरूप नहीं जाना। हम छोटे-मोटे शारीरिक दुखों को ही दुख मानते रहे और उन्हीं से बचने के उपाय भी करते रहे। लेकिन इस पर विचार करना चाहिए।

विमर्श सागर

माता-पिता से बड़ा तीर्थ संसार में नहीं: लब्धियशा

पार्श्व तीर्थ नगपुरा की धर्मसभा में साध्वी लब्धियशा ने कहा कि जिसने जीवन में झुकना सीख लिया, वह सबको अपना बना लेता है और उसे दुनिया में कभी भी झुकने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। आज लोग मुंह में राम बगल में छुरी वाली, कहावत को अधिक चरितार्थ कर रहे हैं।

आज परमात्मा के दर्शन कम और प्रदर्शन अधिक हो रहा है। परमात्मा की भक्ति सधो दिल से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमेशा सम्मानजनक शब्द से बोलना चाहिए। माता-पिता से बड़ा तीर्थ संसार में हो ही नहीं सकता, जिन्होंने माता-पिता की सेवा की है और वह तीर्थ नहीं गए तो भी उनको तीर्थ का फल घर बैठे मिल जाता है। लेकिन आज देश में वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। अपने माता-पिता और गुरु का सम्मान करें। साध्वी ने कहा कि भगवान की भक्ति जो करते हैं वह परम आनंद प्राप्त करते हैं। शास्त्रों में लिखा है भगवान की भक्ति करते-करते भक्त भी भगवान बन जाते। परमात्मा की भक्ति भक्तों को भगवान बना देती है। भक्ति के कारण चुंबक की तरह प्रभु को भी आप प्राप्त कर सकते हैं। साध्वी ने कहा कि जिस प्रकार मीरा अपने प्रभु के लिए पागल सी हो गई थी, लेकिन परमात्मा ने उसे अपना बनाया। परमात्मा की भक्ति बड़ी मेहनत से मिलती है।

लब्धियशा

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