काले किवाड़ों पर नूर की दस्तकें...

Bhilaidurg News - छत्तीसगढ़ का निर्माण 1 नवंबर 2000 को हुआ। परंतु अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के आधार पर इसकी विशिष्ट पहचान काफी...

Bhaskar News Network

Aug 15, 2019, 08:25 AM IST
Bhilai News - chhattisgarh news noor knocks on black doors
छत्तीसगढ़ का निर्माण 1 नवंबर 2000 को हुआ। परंतु अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के आधार पर इसकी विशिष्ट पहचान काफी पुरानी रही है। जब यह मध्य प्रांत और बरार का हिस्सा था और उसकी राजधानी नागपुर में थी, तब भी छत्तीसगढ़ की धमक थी। मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल, नेता प्रतिपक्ष ठाकुर प्यारेलाल सिंह और विधानसभा अध्यक्ष दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त छत्तीसगढ़ से थे। छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय महत्व भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना से मिला। स्वतंत्र भारत में संगठित विकास के नक्शे पर पंजाब का भाखड़ा-नांगल और छत्तीसगढ़ का भिलाई स्टील प्लांट लगभग एक साथ उभरे, जो औद्योगिक संस्कृति भिलाई में विकसित हुई वह देशभर में अनुकरणीय बन गई। भिलाई को लघु भारत की संज्ञा दी गई। भिलाई बिरादरी में पनपी कर्मठता और एकजुटता देशभर के लिए एक मिसाल बन गई। छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों ने देश के कोने-कोने से आए अधिकारियों तथा कर्मचारियों का जिस आत्मीयता से सहयोग दिया वह यहां की सनातन, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के अनुरुप था। बस्तर के बैलाडीला आयरन ओर प्लांट का सम्मोहन जापान के सिर पर चढ़ कर गरजने लगा। यह बात और है कि विकास की लंबी दौड़ में पीढ़ियों के लिए दी गई भूगर्भ की थाती को कच्चे माल के रूप में माटी के मोल बेचना कहां तक सही था? यदि उससे स्टील बनाकर देश की ही छोटी-बड़ी औद्योगिक ईकाई में खपाया जाता, तब हमारे भविष्य का भी धरातल फौलादी बनता। तब यहां के लोगों में अमीर धरती की गरीब संतान का लेबल न लगता।

इस सुलगते हुए सच को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जब किसी वैभवशाली वसुंधरा की संतान निर्धन रह जाती और नैसर्गिक संपदा का लाभ कुछ थोड़े से लोगों तक सिमटने लगता है तो असंतोष का अंकुरण होता है। उसे समय रहते समझा और शांत न किया जाए तो वह विस्फोट के मुहाने तलाशने लगता है। बस्तर जिस तरह पिछले तीन दशकों से माओवादी हिंसा का समरक्षेत्र बना हुआ है, वह इसका साक्ष्य है। इस शाश्वत सत्य को नज़रअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि प्रकृति की जो संपदा धरती के गर्भ में और उसके ऊपर है, उस पर अनेक पीढ़ियों का हक है। इसके सम्यक उपभोग के लिए गांधी का यह वाक्य प्रासंगिक है कि प्रकृति की झोली में सबकी जरूरतें पूरी करने का सामर्थ्य है, परंतु वह किसी एक भी लालची का पेट नहीं भर सकती। अपने ही प्रदेश में विकास की इच्छाशक्ति के दो दृष्टांत स्मरणीय हैं। यहां भूख और कुपोषण का एक शताब्दी से भी अधिक समय का इतिहास रहा है। भाजपा के शासनकाल में बहुत कम दाम पर प्रत्येक परिवार को पर्याप्त खाद्यान उपलब्ध कराने की नीति अपनाई गई। उससे भूख से अकाल मौतों पर प्रभावी अंकुश लगा। दूसरा उजला दृष्टांत वर्तमान कांग्रेस सरकार का है। इसने अपनी एक नीति से सदियों पुरानी इस मान्यता को कि किसान कर्ज में पैदा होता, कर्ज में ही जीवन बसर करता और अगली पीढ़ी के लिए कर्ज का बोझ छोड़ कर इस नश्वर संसार से कूच कर जाता है। 2500 रुपए प्रति क्विंटल में धान खरीदी और किसान परिवारों की अल्पकालीन कृषि़ ऋण माफी के कारण 18 लाख खातों में जमा की गई राशि से संभवतः पहली बार आश्वासनों और चुनावी नारों की खूंटी से उतार कर राहत की रकम किसानों के घरों में पहुंचाई। फिर भी राज्य सरकार के लिए यह आत्ममुग्ध होने का समय नहीं है।

रमेश नैयर वरिष्ठ पत्रकार

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