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आजादी के लिए पाटन थाना फूंकने वाले थे देवादा के स्वतंत्रता सेनानी, बापू से प्रेरित होकर बदला मन फिर गांधीगिरी से विरोध

Bhilaidurg News - आजादी की कहानी प्रदेश में सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों वाले पाटन ब्लाक के गांव देवादा में...

Jan 26, 2020, 06:55 AM IST
Durg News - chhattisgarh news the freedom fighters of devada who were blowing up the patan police station for independence changed their mind inspired by bapu and again opposed to gandhigiri
आजादी की कहानी

प्रदेश में सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों वाले पाटन ब्लाक के गांव देवादा में सेनानियों के 14 परिवार मौजूद हैं। यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत पाटन थाना को आग के हवाले से करने होने वाली थी। इसके लिए ग्रामीणों ने थाना तक घेर लिया। लेकिन आगजनी को अंजाम नहीं दिया। उसी दौरान आचार्य रामदेव के क्षेत्र में गांधी का संदेश लेने पर सेनानियों ने अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन में जाने का फैसला लिया। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत होते ही गांव से गिरफ्तारी भी दी। अब जिले में एक भी स्वतंत्रता सेनानी नहीं बचे। उनके बिना यह पहला गणतंत्र है।

सेनानियों की कहानी : किसी ने नौकरी तो किसी ने त्याग किया जीवन

जिले का सबसे संवेदनशील क्षेत्र था पाटन का यह देवादा गांव

सेनानी रामधीन दुबे के पुत्र मनहरण लाला दुबे ने बताया कि अंग्रेजों के लगान लगाने की घोषणा का विरोध करने के लिए थाना पाटन को आग के हवाले करने का निर्णय लिया। सूचनाएं लीक होने पुलिस के आने की जानकारी पर आगजनी नहीं की। लेकिन इसके बाद से ग्राम देवादा के लोग एक-एक करके आंदोलन में शामिल होने लगे। बताते हैं कि अंग्रेजों की नजर इस गांव पर ज्यादा होती थी।

अब सिर्फ यादें: पहली बार बिना किसी स्वतंत्रता सेनानी के मनाएंगे गणतंत्र दिवस

फोटो:- अजीत िसंह भाटिया

प|ी व बेटे की मौत का मलाल छोड़कर आंदोलन में हुए सक्रिय

सेनानी दौलतराम साहू के पौत्र अनिल साहू ने बताया कि आजादी की लड़ाई में शामिल होने की वजह से पिता को पुलिस पकड़कर ले गई थी। मां और बड़े भाई का देहावसान हुआ, इसकी सूचना किसी तरह जेल भिजवाई गई, लेकिन दौलतराम को जेल से नहीं छोड़ा गया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए। इसके बाद जेल से बाहर आकर दोबारा से लोगों को एकत्रित करने के अलावा बैठकों के निर्देशों का पालन लगने गांव-गांव घूमने लगे।

अंग्रेजों को बैठकों की भनक न लगे, इसलिए फैलाते गलत सूचना

ग्राम देवादा में आंदोलन की अगुवाई करने वाले रामाधीन दुबे से प्रेरित होकर गांव के ही द्वारिका प्रसाद दुबे, बेनी प्रसाद दुबे, राम खिलावन दुबे छेदी लाल दुबे भी आंदोलन में शामिल हो गए। वे भी गांव में अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए अलग-अलग गांव में बैठक की व्यवस्था करते। अंग्रेजों को भ्रमित करने के लिए गलत सूचनाएं भी पहुंचवाते रहते।

स्वतंत्रता सेनानियों के गढ़ देवादा से

सेनानी रामलाल वर्मा के पुत्र डॉ. डोलेचंद्र वर्मा ने बताया कि आजादी के आंदोलन में लोगों को शामिल करने के लिए गांव-गांव में सूचना पहुंचवाने के अलावा बैठकों के लिए व्यवस्था करते। प्रत्येक बैठक के लिए हर बार गांव चुना जाता। भारी संख्या में ग्रामीण इकट्‌ठा भी होते।

रामलाल वर्मा व लखन लाल वर्मा : बैठक के लिए सूचना में मदद


सेनानी दौलत के नाती अनिल ने बताया आजादी के लिए गांव से स्वतंत्रता सेनानियों का कारवां लगातार बढ़ जा रहा था। अंग्रेजी को भी सेनानियों की गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी। ऐसे में अपने लोगों का साथ देने के लिए केजऊराम कोटवार भी कूंद पड़े।

दौलत राम साहू : अंग्रेजों की गतिविधियों पर रखने लगे नजर

मनहरण दुबे ने बताया कि साल 1940 में आचार्य रामदेव क्षेत्र में गांधी का संदेश लेकर आए। उनकी बातों से प्रेरित होकर रामधीन दुबे स्कूल में हेडमास्टर की नौकरी छोड़कर आजादी के आंदोलन में कूदे। फिर आंदोलन में शामिल हुए।

रामाधीन दुबे : गांधी के संदेश से प्रेरित होकर छोड़ी नौकरी

पोषण ने बताया उस दौरान मालगुजार रहने के दौरान अंग्रेजों का विरोध शुरू किया। ब्रिटिश सरकार की काफी जानकारियां उनके पास आती थी। उनसे से ही प्रेरित होकर रामेश्वर और बेटे लखन और रामलाल सामने आए।

चुगनू प्रसाद : ब्रिटिश सरकार की सूचना एकत्रित करते थे

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