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छत्तीसगढ़ / बस्तर में कांग्रेस और भाजपा दोनों को भरोसा, बदलेगा 8-4 का समीकरण



बस्तर में तेंदुपत्ता संग्राहकों की फाइल फोटो। बस्तर में तेंदुपत्ता संग्राहकों की फाइल फोटो।
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बस्तर में तेंदुपत्ता संग्राहकों की फाइल फोटो।बस्तर में तेंदुपत्ता संग्राहकों की फाइल फोटो।
  • 18 सीटों की ग्राउंड रिपोर्ट: 2013 विधानसभा चुनाव से बेहतर करने का दबाव दोनों दलों पर

Dainik Bhaskar

Nov 12, 2018, 05:50 AM IST

बस्तर से लौटकर राजकिशोर भगत

8-4 का समीकरण बस्तर में इस चुनाव का दिलचस्प समीकरण है। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झीरम कांड ने सत्तारूढ़ पार्टी को काफी नुकसान हुआ था। भाजपा के पास फिलहाल चार सीटें हैं। उसके लिए यह समीकरण बदलना जरूरी है, क्योंकि इसके बिना इस बार प्रदेश में सरकार सरकार का रिपीट होना असंभव है। कांग्रेस के लिए 8 के समीकरण को बचाना या इससे बेहतर होना जरूरी है। क्योंकि सत्ता

परिवर्तन का सपना तभी साकार होगा। दिलचस्प यह भी कि इस बार बस्तर की 12 में से 8 सीटें ऐसी हैं, जहां परंपरागत प्रतिद्वंदी आमने-सामने हैं। वहीं 4 सीटें ही ऐसी हैं, जहां भाजपा या कांग्रेस ने अपना चेहरा बदला है। प्रदेश में भले ही भाजपा की सरकार रही हो लेकिन बस्तर के पिछले आंकड़े कांग्रेस के लिए सर्वश्रेष्ठ रहे हैं। यह भी याद रखना होगा कि पिछले चुनाव ने इस मिथक को तोड़ा था कि सत्ता की चाबी बस्तर की 12 सीटें हैं। अनुमान के विपरीत बस्तर और सरगुजा में खराब प्रदर्शन के बावजूद भाजपा मध्यक्षेत्र में अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सरकार बचाने में सफल रही थी। इस लिहाज से देखा जाए तो बस्तर में भाजपा के खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। और कांग्रेस के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। दरअसल यहां सीटें कम ज्यादा पाने से ज्यादा दोनों ही दलों के सामने पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है। 

 

हर बार होता है... इसलिए दीवारों पर लिखवाया- मुर्गा-दारू नहीं चलेगा

बकरा भात

सुकमा. मुर्गा-दारू नहीं चलेगा...बकरा भात नहीं चलेगा। जी हां...ये अपील उन प्रत्याशियों के लिए हंै जो इस प्रकार के चंद आयोजनों से मतदान प्रभावित करते हैं। तस्वीर सुकमा जिले के पोलमपल्ली गांव की है। चुनाव आयोग को भी इस बात का अंदेशा है। इसलिए आयोग ने इनसे बचने के लिए दीवारों पर ऐसे संदेशों के माध्यम से मतदाताओं को जागरूक कर रहे हैं। फोटो: प्रवीण देवांगन 

 

इधर... नक्सलियों ने बना रखे हैं स्पाइक होल 

नक्सलियों के स्पाइक होल


नकुलनार. जंगलों में जवानों को निशाना बनाने के लिए नक्सलियों ने ऐसे कई स्पाइक होल बना रखे हैं। कुआकोंडा थाना क्षेत्र के धनिकरका इलाके के जंगल में फोर्स को सर्चिंग के दौरान ऐसे ही 14 स्पाइक होल मिले। फोटो: प्रदीप गौतम 

 

जिन 8 सीटों पर प्रत्याशी नहीं बदले वहां बढ़त लेना चाहेगी भाजपा 
भानुप्रतापपुर, कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा, बीजापुर और कोंटा में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने 2013 के प्रत्याशी रिपीट किए हैं। इन आठ में से 6 पर कांग्रेस का कब्जा है। जिन दो सीटों पर भाजपा जीती, वहां के दोनों विधायक भाजपा सरकार में मंत्री बनाए गए। इन दोनों की साख दांव पर है। मौजूदा हालात के मुताबिक अगर भाजपा यहां दो सीटें ज्यादा जीतती है तो भी भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी पर अटक जाता है। 


चार सीटों पर भाजपा और कांग्रेस ने प्रत्याशी बदले, यहां दोनों बराबरी पर 
अंतागढ़, कांकेर, केशकाल, जगदलपुर में भाजपा या कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी बदले हैं। कांकेर ही एक ऐसी सीट है, जहां भाजपा कांग्रेस दोनों ने इस बार नए प्रत्याशी पर दांव खेला है। इन चार में से दो सीटें भाजपा और दो सीटें कांग्रेस के पास हैं। कांग्रेस पिछली बार जीती दोनों सीटों पर खुद को सेफ मान रही है। वहीं भाजपा के लिए पिछली बार आसान रही जगदलपुर सीट बचाना इस बार टेढ़ी खीर साबित हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण दोनों दलों में अंदरूनी विवाद भी है। 

 

विपक्ष के खिलाफ भी एंटीइंकम्बेंसी 
यह सुनने में आश्चर्यजनक लगे, लेकिन सच है। पूरे इलाके में जहां-जहां भाजपा के विधायक हैं, वहां विकास के लिए फंड ज्यादा पहुंचा है। वहीं कांग्रेसी विधायकों को सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने में खूब पसीना बहाना पड़ा है। कुछ लोगों के बीच ऐसी भी चर्चा सुनने को मिली कि हमारे क्षेत्र का विकास इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि हमारे विधायक विपक्ष में आ गए। वहीं कांग्रेस के कुछ विधायकों की कार्यशैली लोगों को चुभ रही है। खासकर महिला विधायकों पर आरोप लग रहे हैं कि उनकी विधायकी का लाभ उनका परिवार उठा रहा है। इधर सरकार के खिलाफ स्वभाविक एंटीइंकम्बेंसी तो है ही। 

 

कोंटा का फैसला तीसरा पक्ष करेगा 
कोंटा विधानसभा का अधिकांश हिस्सा हार्डकोर नक्सली जोन माना जाता है। यहां सबसे बड़ी चुनौती वोटिंग की है। यहां पिछली बार महज 32 हजार वोट पाने वाले लखमा भी 17 हजार वोटों से जीते थे। भाजपा यहां तीसरे नंबर पर रही थी। इस बार भी यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और सीपीआई के बीच माना जा रहा है। 


दंतेवाड़ा में नक्सली घटनाएं ज्यादा 
पिछली बार नक्सली घटनाएं सुकमा जिले में ज्यादा थीं। इस बार दंतेवाड़ा में ज्यादा घटनाएं हुईं है। बस्तर में नक्सली घटनाओं का असर मतदान प्रतिशत पर दिखता है। पिछली बार कोंटा में महज 48% वोटिंग हुई थी। दंतेवाड़ा में पिछली बार 62% मतदान हुए थे। अगर नक्सली घटनाओं का असर वोटिंग पर दिखा तो नतीजे प्रभावित होंगे। 

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