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गाय-भैंस और प्लॉट देने के नाम पर कराया इन्वेस्ट, फिर मुकरा, फोरम ने लगाया 1 करोड़ का जुर्माना

एक वर्ष पहले
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  • यालको ग्रुप के खिलाफ 161 लोगों ने 71 लाख रुपए की रिकवरी के लिए दायर किया था फोरम में वाद
  • मेच्योरिटी से पहले ही बंद कर दी थी कंपनी, एक ही दिन में फोरम ने सुनाया सभी प्रकरण में फैसला
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दुर्ग. निवेशकों को स्कीम के तहत पशुधन गाय-भैंस व मुर्गा-बकरा और आवासीय प्लाट जैसे लुभावने वादे करके इनवेस्ट कराने वाली चिटफंड कंपनी यालको एग्रो लिमिटेड के डायरेक्टर्स पर जिला उपभोक्ता फोरम ने 1 करोड़ 28 हजार 650 रुपए का जुर्माना लगाया है। कंपनी के संचालकों ने 161 लोगों का 71 लाख 43 हजार 650 तमाम स्कीम्स के तहत निवेश कराया। मेच्योरिटी होने से पहले ही कंपनी बंद कर दी। जिला उपभोक्ता फोरम पहुंचे निवेशकों के परिवादों सुनवाई करते हुए एक ही दिन में 161 प्रकरणों फैसला सुनाकर राहत दी है। 

1) सेबी का हवाला देकर कंपनी बंद कर दी थी 

जेल में निरुद्ध कंपनी के डायरेक्टर प्रेमलाल देवांगन और ममता किरण देवांगन ने निवेश कंपनी खोलकर ज्यादा रकम वापसी और जमीन और पशुधन देने का वादा करके हजारों को लोगों को झांसे में लिया। लेकिन सेबी से रजिस्टर्ड नहीं होने के चलते कंपनी पर ताला लग गया। ऐसे में रकम वापसी के लिए लोग उपभोक्ता फोरम पहुंचे। गुरुवार को एक साथ 161 प्रकरणों में फैसला देकर इस साल का रिकार्ड भी कायम किया है। 

परिवादियों ने फोरम को जानकारी दी कि यालको एग्रो लिमिटेड ने निवेश के दौरान एग्रीमेंट करके रिटर्न का वादा किया। इसके चलते उन्होंने कंपनी में 71 लाख 43 हजार 650 रुपए जमा करा दिए। संचालकों ने वादा कि था कि मेच्योरिटी पूरी होने पर उनके निवेश के मुतबिक, मुर्गा, बकरा, बैल और आवासीय प्लाट मिल जाएंगे। सेबी का हवाला देकर डायरेक्टर प्रेमलाल देवांगन और ममता किरण ने कंपनी बंद की। 

इससे पहले 13 मई को जिला उपभोक्ता फोरम ने यालको एग्रो लिमिटेड के संचालकों के खिलाफ दायर 79 प्रकरणों की एक साथ सुनवाई की थी। उस दौरान परिवादियों का कहना था कि उन्होंने कंपनी में 39 लाख 47 हजार 375 रुपए निवेश किए। उसके एवज में जेल में निरुद्ध कंपनी के डायरेक्टरों ने 12 परिवादियों को बकरा और 4 को मुर्गा तक लौटाने का वादा किया था। इसके अलावा 33 मामले जमीन से संबंधित थे। 

चिटफंड कंपनी यालको एग्रो लिमिटेड के खिलाफ दायर प्रकरणों की सुनवाई के दौरान सदस्य राजेंद्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने परिवादियों द्वारा मांगी गई मानसिक क्षतिपूर्ति की मांग को जायज माना। फोरम का कहना है कि जब भी कोई व्यक्ति ऐसी संस्थाओं में रकम जमा करता है। अनावेदक द्वारा अनियमितता की वजह से रकम वापस नहीं मिली। ऐसी परिस्थिति में निवेशक की मानसिक वेदना जायज है। 

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