घोषणा / 25 साल की मांग पूरी, बिलासपुर का 5वां हिस्सा टूटकर बन जाएगा छत्तीसगढ़ का 28वां जिला



bilaspur news 5th part of Bilaspur will be broken into 28th district of Chhattisgarh
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bilaspur news 5th part of Bilaspur will be broken into 28th district of Chhattisgarh

  • पहले कोरबा, मुंगेली, जांजगीर-चांपा जिले बन चुके हैं, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही चौथा जिला होगा 
  • एटीआर के बाद जालेश्वर महादेव भी बाहर, बिलासपुर अब महज चार विकासखंड का जिला 
  •  बिलासपुर की पहचान था विष्णु भोग चावल , अब यह नए जिले की पैदावार कहलाएगा 

Dainik Bhaskar

Aug 17, 2019, 12:23 PM IST

बिलासपुर. स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की घोषणा के साथ ही पेंड्रा इलाके को जिला बनाने की 25 साल पुरानी मांग पूरी हो गई है। हालांकि नाम रखने में थोड़ी राजनीतिक चतुराई करते हुए इसे नाम दिया गया है-गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मुख्यमंत्री ने जिले के नाम में मरवाही को शामिल कर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के क्षेत्र में उन्हें मात दी और अगले विधानसभा चुनाव में वहां के मतदाताओं को सोचने के लिए विवश किया। माना जा रहा है कि जिले को अस्तित्व में आने में 6 से 8 माह लगेंगे। 

बघेल ने मरवाही में किया वादा 6 माह में पूरा किया 

  1. मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपेश बघेल पहली बार 5 मार्च को मरवाही के लोहारी में किसान सम्मेलन में गए तो उन्होंने जिला मुख्यालय से दूरी बताते हुए कहा कि लोगों को परेशानी होती है। उनके कार्यकाल में ही जिला बन जाएगा। इसकी प्रक्रिया जल्दी शुरू होगी। जिले का नाम क्या रखना है? यहां के लोग तय कर लें। मंच पर नाम को लेकर विवाद होने पर उन्होंने साफ कहा-झगड़ा करोगे तो जिला नहीं बनाउंगा। मुख्यमंत्री ने 6 माह में अपना वादा पूरा कर दिया। सालों से आंदोलित लोगों को बड़ी राहत मिली है। 

  2. गौरेला-पेंड्रा- मरवाही जिला बनने से बिलासपुर को क्या मिलेगा और क्या खोएगा 

    वैभवशाली अतीत वाले बिलासपुर के विखंडन से सियासत में जिले का रसूख कम से कमतर होता जा रहा है। 1998 के पहले तक जिले में 19 विधानसभा क्षेत्र हुआ करते थे। अविभाजित मध्यप्रदेश में चार कद्दावर मंत्री हुआ करते थे। विखंडन के बाद अब उसकी पहचान चार विकासखंडों बिलासपुर, बिल्हा, तखतपुर और मस्तूरी में सिमट कर रह गई है। तीन दशक पहले औद्योगिक नगरी कोरबा, हसदेव बांगो बांध, विश्व प्रसिद्ध चांपा कोसा, अचानकमार अभयारण्य और अमरकंटक से लगे प्राचीन जालेश्वर महादेव उसकी पहचान हुआ करता था। 

    • घट जाएंगे 2 नगर, 162 पंचायत, 225 गांव: वर्तमान में बिलासपुर जिले में 12 नगरीय निकाय, 933 गांव तो 645 पंचायतें है। नया जिला बनने पर दो नगर पंचायत, 162 पंचायत और 225 गांव गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में चले जाएंगे। तीन जनपद पंचायत, 74 पटवारी हल्का, तीन थाने, तीन आरआई सर्कल, मौसम वेधशाला भी जिले से अलग हो जाएगा। 
    • कम होगा 851.868 हेक्टेयर वनक्षेत्र  : नए जिला बनने के साथ ही गौरेला-पेंड्रा-मरवाही बिलासपुर जिले से जंगल के क्षेत्रफल के मामले में बड़ा हो जाएगा। बिलासपुर वनमंडल में 783.362 हेक्टेयर जंगल रह जाएगा जबकि मरवाही वन मंडल में 851.868 हेक्टेयर जंगल है। यानी इतना वनक्षेत्र बिलासपुर जिले का कम हो जाएगा। 2307.39 वर्ग किमी हिस्सा चला जाएगा : वर्तमान में बिलासपुर जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल 5815.87 वर्ग किमी में फैला हुआ है। 2307.38 वर्ग किमी गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में चला जाएगा। यानी 39.67 फीसदी भू-भाग बिलासपुर का कम हो जाएगा। 

  3. टूटते गए जिले, राजनीतिक रसूख खोता गया बिलासपुर 

    1998 में चांपा-जांजगीर और कोरबा अलग हुआ। 9 विधानसभाएं कम हो गईं। बाल्को, पॉवर प्लांट, जांजगीर की विरासत छिन गई। 
    2012 में मुंगेली अलग हुआ। अचानकमार टाइगर रिजर्व सहित बेशकीमती साल, सागौन का जंगल जिले से बाहर हो गया। 
    2019 के तीसरे विखंडन के बाद गौरेला, पेंड्रा व मरवाही के साथ विष्णुभोग चावल का उत्पादक मरवाही, जालेश्वर महादेव, बाक्साइट व वन संपदा का बड़ा भाग बिलासपुर से अलग हो गया। 

  4. आदिवासी विकास कार्यालय पर संकट 

    गौरेला,पेंड्रा, मरवाही में 57.09 फीसदी आबादी आदिवासियों की है। 2011 की जनगणना के मुताबिक वहां की जनसंख्या 3 लाख 36 हजार 420 है जिसमें 1 लाख 92 हजार 73 आदिवासी हैं। बिलासपुर में आदिवासी विभाग का कार्यालय बंद भी हो सकता है क्योंकि अगर 40 फीसदी से कम आदिवासी हुए तो छात्रावास-आश्रम संचालन का जिम्मा स्कूल विभाग को दिया जा सकता है। 

  5. 1861 में बना था बिलासपुर जिला 

    गजेटियर के मुताबिक बिलासपुर का नाम बिलासा नामक मछुआरिन के नाम पर पड़ा। जूना बिलासपुर में किसी समय मछुआरों की बस्ती हुआ करती थी।जिले का गठन 1861 में हुआ। म्युनिस्पैलिटी 1867 में अस्तित्व में आया। 1901 में बिलासपुर की जनसंख्या 18937 थी, जो कि सर्वाधिक आबादी वाले अंग्रेजी राज के केंद्रीय सूबे में आठवें स्थान पर थी। 1854 में ब्रितानी सरकार की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बिलासपुर का अधिग्रहण किया। इससे पहले 1774 में यह रतनपुर के कलचुरी राजवंश का हिस्सा था। 

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