जल संकट / अरपा सूखी, 57 ट्‌यूबवेल फेल, कुदुदंड में 58 साल पुराने दो बोर बंद, 140 जगह मोटर पंप नीचे उतारे

गोंड़पारा से मेलापारा जाने सूखी अरपा में रास्ता बन गया है। गोंड़पारा से मेलापारा जाने सूखी अरपा में रास्ता बन गया है।
जल स्त्रोत नहीं होने से बारिश में भी इसमें कम ही पानी ठहरता है। जल स्त्रोत नहीं होने से बारिश में भी इसमें कम ही पानी ठहरता है।
शहर से सिरगिट्‌टी तक टैंकर पहुंचते ही ऐसे नजारे आम हो गए हैं। शहर से सिरगिट्‌टी तक टैंकर पहुंचते ही ऐसे नजारे आम हो गए हैं।
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गोंड़पारा से मेलापारा जाने सूखी अरपा में रास्ता बन गया है।गोंड़पारा से मेलापारा जाने सूखी अरपा में रास्ता बन गया है।
जल स्त्रोत नहीं होने से बारिश में भी इसमें कम ही पानी ठहरता है।जल स्त्रोत नहीं होने से बारिश में भी इसमें कम ही पानी ठहरता है।
शहर से सिरगिट्‌टी तक टैंकर पहुंचते ही ऐसे नजारे आम हो गए हैं।शहर से सिरगिट्‌टी तक टैंकर पहुंचते ही ऐसे नजारे आम हो गए हैं।

  • 10 साल में सबसे बड़ा जल संकट : जिले के 133 गांव पानी के लिए तरस रहे, 22 वार्डों में समस्या गंभीर 
  • 19 टैंकर व 6 वॉटर लारियों के जरिए सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक 100 से अधिक स्थानों पर पानी सप्लाई

Jun 18, 2019, 10:58 AM IST

सूर्यकान्त चतुर्वेदी। बिलासपुर. शहर सहित जिले के ग्रामीण क्षेत्र भीषण जल संकट की चपेट में हैं। आंकड़े बताते हैं कि इस बार जैसा सूखा पिछले 10 सालों में भी नहीं पड़ा। जिले के 909 गांवों में से 133 गांव जल संकट की चपेट में हैं। इनमें से 22 गावों में स्थिति चिंताजनक है। शहर के बीच से बहने वाली अरपा नदी पूरी तरह सूख गई है। कहीं कहीं नाले, नालियों का सड़ांध मारता पानी जमा है। नलों से गायब टोटियां, पानी के बेकार बहने, अरपा के संरक्षण के अभाव, पानी बचाने के उपाय न होने सहित कई कारणों से जल संकट लगातार बढ़ता ही जा रहा है। 

45 नए बोर खोदे, भूजल की थर्ड लेयर से लिया जा रहा है पानी

अरपा से चार्ज होने वाले तटवर्ती ट्यूबवेल का बुरा हाल है। सरकंडा से तोरवा तक पेयजल सप्लाई वाले 57 ट्यूबवेल सूख गए हैं, जिनसे वार्डों में सीधे और पानी टंकियों में भर कर पानी सप्लाई किया जाता था। शहर में पानी सप्लाई के लिए कुदुदंड पंप हाउस में म्युनिस्पैलिटी के समय 1961 में कराए गए चार में से दो बोर सूख गए हैं। वहीं 4 बोर में जल स्तर घटने पर राइजिंग पाइप बढ़ाना पड़ा। वार्डों की हालत और खराब है। 

66 वार्डों वाले शहर के 22 वार्ड में जल संकट है और 19 टैंकर और 6 वाटर लारियों के जरिए सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक 100 से अधिक स्थानों पर 130-140 ट्रिप पानी सप्लाई किया जा रहा है। बारिश में देरी हुई तो वार्डों में पेयजल संकट स्थिति और गंभीर होने का अंदेशा है। कुछ वर्षों में शहर और जिले में ट्यूबवेल की संख्या दोगुनी हो गई तो भू जल के थर्ड लेयर से पानी लिया जा रहा है। 

तथ्य से स्पष्ट 

  • कुदुदंड पंप हाउस में स्थापना के 58 साल में पहली बार दो बोर सूखे चार मोटर पंप को 15 से 25 फुट लोवर करना पड़ा। 
  • दस साल पहले तक आज की तारीख में बमुश्किल 10 पंपों को लोवर करने की नौबत आती थी, आज 140 पंप लोवर किए जा चुके हैं। 
  • गर्मियों में बमुश्किल 10-12 स्थानों पर टैंकर सप्लाई की स्थिति बनती थी, आज 100 से अधिक स्थानों पर नियमित टैंकर भेजे जा रहे हैं। 
  • इस सीजन में बोर फेल होने पर 45 स्थानों पर नई बोरिंग कराई जा चुकी है। 
  • बोर सूखने का क्रम जारी है। 12 जगहों से बोरिंग कराने की मांग आई है, जो प्रक्रिया में है। 

क्यों गहराई जल समस्या

  1. औसत बारिश में गिरावट। 1995 में थी 1800 मिलीमीटर। 2008 में 892 मिमी, 2018 में 843 मिमी। 
  2. 1997 में जिले में वनों का फैलाव 19897 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था, अब घटकर 8298 वर्ग किलोमीटर रह गया। 
  3. सतही जल की बजाय भूगर्भ जल (बोरिंग) का अधिकाधिक इस्तेमाल। 
  4. जिले में 2200 ट्यूबवेल हुआ करते थे, अब बढ़कर 5000 से अधिक ट्यूबवेल संचालित हो रहे। 
  5. 2006 में शहर में 3 पानी टंकियां और 212 बोर थे, अब 25 टंकियां और 570 ट्यूबवेल खोदे जा चुके हैं। 

सरकार ये करे

  • भूगर्भ जल की सारी योजनाओं को बंद कर सतही जल में परिवर्तित करे।  मनमानी बोरिंग पर पाबंदी लगाई जाए। 
  • शहरों में पानी के उचित उपयोग, उसकी महत्ता को समझाने 24 बाई 7 और मीटरिंग प्रणाली लागू की जाए। 
  • तालाबों में बारिश का पानी संरक्षित करने के लिए पैठू की पुरानी संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाए। 
  • प्रत्येक मकान में रिचार्ज के लिए रैन वाटर हार्वेस्टिंग और पेड़ लगाने की शर्त पर मकान निर्माण की अनुमति दी जाए। 
  • उद्योगों में बांध और नदियों के पानी का इस्तेमाल बंद कर उसकी जगह सीवेज के पानी का उपयोग सुनिश्चित किया जाए। 
  • अरपा सहित तालाब व जलस्रोतों के आस पास की भूमि केवल पौधरोपण के लिए आरक्षित कर रोपण सुनिश्चित किया जाए। 

हम ये करें तो मिल सकती है राहत 

  1. हर घर, कांप्लेक्स, बगीचे में रैन वाटर हार्वेस्टिंग सोख्ता गड्ढा,बनाकर वर्षा का पानी रोकें।
  2. प्रत्येक मकान के आस पास पौधे लगाएं और निस्तारी पानी का उपयोग बागवानी में करें।
  3. ओवरहेड टैंक भरने के लिए टाइमिंग सेट करें या फिर उसे कम भरें। 
  4. घर हो या बाहर, टोटी खुला न छोड़ें, न छोड़ने दें, गाड़ी धोने में पानी का बेजा इस्तेमाल न करें। 
  5. अरपा में कचरा न फेंके और न ही किसी को फेंकने दें। अवैध उत्खनन बंद कराने में मदद करें। 

3 दशक पहले तक अरपा में गर्मियों में भी पानी रहता था। एक -डेढ़ हाथ खोदने पर पानी ओगर जाता था। पेंड्रा के अमरपुर स्थित उद्गम से लेकर शहर तक अधिकांश जगहों पर पानी नहीं है। अरपा भैंसाझार, लच्छनपुर व्यपवर्तन, खोंगसरा व्यपवर्तन, सल्का व्यपवर्तन, सल्का व्यपवर्तन, आमामुड़ा व्यपवर्तन में पानी रोकने के कारण बारिश के बाद शहर तक अंत:सलिला में पानी ठहर नहीं पा रहा है। अरपा के तटवर्ती क्षेत्रों का पेरेनियम जोन डिस्टर्ब हो चुका है। 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ भवन में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अरपा रियल स्टेट का मामला नहीं है। अरपा जीवनदायिनी नदी है। अरपा में जल पुनर्भरण की दिशा में काम कराया जाएगा। अरपा से हम सबका भावनात्मक लगाव है। हम लोगों ने पदयात्राएं भी की है। आज अरपा सूख गई है। उसे बचाने का समय आ गया है। जितने भी नाले अरपा से निकलते हैं या उसमें मिलते हैं। उन्हें भी पुनर्जीवित किया जाएगा जिससे धार बनी रहे और अरपा पुनर्जीवित हो सके। 

भास्कर एक्सपर्ट पैनल 

  • डॉ. पुष्पराज सिंह, एचओडी (ग्रामीण प्रौद्योगिकी) सीयू 
  • डॉ. एसएस सिंह, प्रोफेसर (फॉरेस्ट्री) सीयू 
  • डॉ. सोमनाथ यादव संयोजक अरपा बचाओ समिति 
  • अनिल तिवारी पर्यावरण प्रेमी 
  • बीके श्रीवास्तव रिटायर्ड एसई 

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