छत्तीसगढ़ के चिन्हारी हवय राउत महोत्सव

Bilaspur News - बिलासपुर के राऊत नाचा बड़े तिहार बन गिस हे। एेतेक बड़े के जम्मा छत्तीसगढ़ म एहर ठऊके हाव। एेका देखे बर देस-परदेस ले...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 06:46 AM IST
Bilaspur News - chhattisgarh news chinhari havay raut festival of chhattisgarh
बिलासपुर के राऊत नाचा बड़े तिहार बन गिस हे। एेतेक बड़े के जम्मा छत्तीसगढ़ म एहर ठऊके हाव। एेका देखे बर देस-परदेस ले आने वाला लोगन तको चाहत रहिथें। ए खानी ये तिहार एे महीना के 16 नवंबर दिन सनिचर के होही। सास्त्री स्कूल के चारों मुड़ा आनी बानी के चीज, मेला लग जाथे। राऊत नाचा 42 साल पहिली सुरू होए रहिस। एका सुरू कराए बर समाज के सिहना अउ वो टेम म मंत्रिरी रहिस बीआर यादव बड़ उदिम करिस। अोखरे प्रेरणा ले हमन एेला हर साल मनावत हावन। ये परब म सब्बो यादव समाज के मन तो जुरबे करथें आन समाज के मन बेवस्था करे अऊ देखइया बन के हिस्सेदार बनथें। असल में ये तिहार खुसहाली के तिहार हे। धान कटे के बाद किसान करा धान के संग पैसा, कउड़ी सब आ जाथे। ओखर साल भर के मिहनत के फल मिलथे। गाय गरुआ के सेवा करैया यदुवंशी समाज गऊ माता के सिंगार करे बरे सुहाई बांधथे। फेर नाच कूदत घरों घर धान छींच के सब ल आशीष देथें। माने ये तिहार खाली यदुवंशी मन के नईए। एखर अगोरा सबे समाज हर करत रहिथे के कब बाजा-गाजा के साथ यदुवंशी मन नाचत कूदत आहीं और उन मन ल ‘जुग जियो लाख बरिस’ के आसीस देहीं। गऊ माता के नरी में सुग्घर सुहाई बांधहीं। यादव समाज ए परब के माध्यम ले अपन जीवन के उमंग और उल्लास ल कलापूर्ण ढंग ले ब्यक्त करथें। ये बड़का तिहार ह अब देश भर म छत्तीसगढ़ के चिन्हारी बन गे हवै। ये अइसे लोकोत्सव हवय जेमा हमर गांव के सीधा-सादा जिनगी के सुग्घर रूप दरपन कर जुग जुग ले दिखाई देथे। एकरे बर नृत्य कला ल लोक जीवन के पहिचान कहे जाथे। राउत नाच म लोक सिल्प, लोक संगीत, लोक साहित्य, लोक नाट्य अउ लाेकनृत्य अद्भुत सामंजस्य हे। राउत नाच एक सम्पूर्ण कला हे। राउत नाच के माध्यम ले लोक जीवन के ससक्त पहलु ल देखे जा सकत हे। बिलासपुर जिला म राउत नाच के परब प्रबोधनी अकादसी ले सुरू होके पन्द्रह दिन तक चलथे। गांव-गांव म राउत मन के टोली अपन नाच ल परदरसन करथें। सहर के गली-मुहल्ले म भी एमन नाचथें। ए परब के समापन बिलासपुर म अरपा के तीर शनिचरी बाजार म आयोजित महोत्सव के साथ होथे। इहां एला राउत बजार के नाम ले जाने जाथे। सहर के बीचों-बीच ये बजार म चारों ओर हजारों मनखे मन के सामने यादव लोकनर्तक टोली अपन नृत्यकला के मनोहारी परदरसन करथें। अपन पुराना वेसभूसा म सजे-धजे राउत नरतक झूमत नाचत अउ दाेहा के उच्चारन करत देखइया सुनइया मनखे के मन ल आनंदित कर देथें। लोक वाद्य के लय-ताल ओकर थिरकत पांचों ओर लाठी म संतुलन ल देखके मन खुसी के अनुभव करथे। बीच-बीच म ओमन सस्त्रों के चालन के अद्भुत कौसल परदरसित करथें त दरसक मन खुसी के माने ताली बजाय लगथें। ये नाच हर श्रृंगार अउ वीरता के अनोखा संगम आए। राउत नाच म सिंगार अउ सौर्य के बहुत ही सुंदर समन्वय होथे। एकर साज-सज्जा अउ सिंगार आकरसक होथे। राउत मन के मुड़ म लाली सफेद धारी बाले सुग्घर पागा अउ ओमा कलगी घलो खोसें रहिथें। पागा म मोर पंख के कलगी घलोक होथे। कमीज के जगा म सरीर के ऊपरी हिस्सा म रंग-बिरंगा कपड़ा के सलूखा पहिनथे अउ ओकर ऊपर कौड़ी के एक जाकिटनुमा पोसाक होथे जेला इहां पेटी कहिथें। ये हर रोसनी म चमकत रहिथे। दूनो बाही म कौड़ी के बने बंहकर बंधाए होथे। कमर के नीचे पहिने जाने वाले पोसाक ल चोलना कहे जाथे जो हर रंगीन अउ आकरसक छींटदार आेनहा के होथे। एला जलाजल कहे भी जाथे। नाचत समय एमन घुंघरू के आवाज हर अड़बड़ सुग्घर लगथे। सुनके मजा आ जाथे। एमन के पूरा वेसभूसा एक कवच के जइसे होथे। इकर एक हाथ म लाठी होथे। ये लाठी तेंदू के होथे। ये प्रकार ले अपन साज-सज्जा म राउत नर्तक मन योद्धा के समान दिखाई देथें। चेहरा म ऐमन वृन्दावन के पिंवरा माटी के रंग ल लगाके भगवान किसन बर श्रद्धा बताथें। ये मिट्‌टी ल रामरज कहे जाथे। राउत मन आंखी म काजर अउ माथा म चंदन के टीका लगाए रहिथें। दुनो गाल अउ ठोड़ी म काजल के बिंदिया होथे। ये पूरा श्रृंगार के बाद राउत नर्तकों के चेहरा हर अबड़ेच सुग्घर दिखाई देथे। राउत नर्तक के सीधे हाथ म लाठी और दूसर हाथ म लोहा अउ पीतल के ढाल होथे। जेला फरी कहिथें। राउत नाच म लोक वाद्याें के परयोग होथे। ह दल के साथ एक लोक वादक दल होथे जेन मन गंधर्व जाति के ही होथें। एला देव वाद्य कहे जाथे। राउत नाच म प्रयुक्त होने वाला वाद्य यंत्र म डफड़ा वेसभूसा औरत मन के तरह होथे। एला परी कथे। महोत्सव के दिन पूरा बिलासपुर नगर के वातावरण राउत नृत्यमय हो जाथे। सड़क अउ गली ह राउत नाच के लय ताल म बुड़े कस लगथे। दिन उगते सात गांव के मनखे मन के आना जाना चालू हो जाथे। बहुत बड़े संख्या म सहर के मन घलो एे तिहार मे दरसक के रूप में सामिल होथें।

डॉ. कालीचरण यादव बिलासपुर

ये तिहार बिलासपुर के संस्किरिति ल देस-बिदेस तक म ठउके हे

16 नवंबर बर बिसेस

लोकनाचा के राजा राउत नाच

छत्तीसगढ़ के अन्न र| से भरे भुइंया के संसकिरति ह तक बहुत बड़का है। इहां के मनखे मन सीधा अउ मेहनती होथे। साथे म गीत नाच अउ संगीत ल भी परेम करथे। तेकर सेतिक लाेक नाच ह बन म खिले फुल कस जघा-जघा दिखाई देथे। गेड़ी नाच, पंथी नाच, करमा नाच, सुआ नाच, राउत नाच मन हमर छत्तीसगढ़ ल नवा रंग म भरथे। जेन तरह रंग-बिरंग के फुल म गुलाब के फुल ह अपन सुंदराई अउ सुगंध म अलग दिखाई देथे। ओइसनहे राउत नाचा ह अपन सुंदराई अउ सजावट म सब नाच ले अलग दिखथे। सुंदर गठे सरीर, छरहरा सजे-धजे लाठी लिए राउत ल नाचत देखके अइसे लगथे जइसे भगवान हर इन मनला एक्के जइसे बनाय हे। राउत नाच के बारे म ऐसे कहे जाथे के जब किसन भगवान हर ग्वाल बाल मन ल इन्द्र के पूजा करना छोड़के अपन असली धन गोबरधन पहाड़ अउ गाय मन के पूजा करे बर कहिस तव इन्द्र हर गुसिया गे। अउ भारी पानी गिराये लागीस। भारी पानी ले अपन ग्वाल बाल सखा मन ल बचाय बर गोबरधन परवत ल किसन भगवान हर अपन चीनी अंगुरी म उठा लिहिस। किसन ल गोबरधन परबत ल उठात देखके जम्मे ग्वाल बाल मन अपन लाठी म गोबरधन परबत म टिकाइन अउ किसन भगवान के भार ल कम करीन इन्द्र हारिस अउ पानी गिराना ल बंद करके किसन भगवान के गोड़ तरी गिरिस। सब ग्वाल बाल खुस होगे। अउ अपन-अपन लाठी ल लेके नाचे लागीन तब ले राउत नाच के परम्परा बनीस किसन भगवान के बंसज ल छत्तीसगढ़ म राउत कइथे ऐकरे बर ऐला राउत नाच कइथे। लोक रीति से अलग हटकर देखे जाये जब ये नाच हर अपन जीविका के प्रति अभार अउ गाय पालन और वोकर सेवा भी हे। राउत मन के मुख्य जीविका गाय पालन अउ वोकर सेवा हे। ये नाच द्वारा राउत मन नाच गा के भगवान संग गाय अउ मालिक के बढ़ोती के बिनती करथे। ये नाच म लाठी लेके नाचे के कारण लाठी ह राउत मन के जीवन के असल भाग ये। लाटी म गाय मन ल छेकना हकालना जंगल के सांप बिच्छु ले अपन रक्छा करना हे। जब राउत मन अरर भाई हो कइके हाना बोलथे तब देखईया मन के जीव ह सुख म भर जाथे। राउत नाचा म नचइया राउत मन जन्मजात होथे अउ छत्तीसगढ़ के सब्बो झन मन इकर देखईया ये। 15 दिन तक चलईया राउत नाच छत्तीसगढ़ियां मन ल सुख से भर देथे।

ध्रुव सिंह ठाकुर बिलासपुर

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