सिम्स: वार्ड बहुत दूर हैं ओटी से

Bilaspur News - छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में मरीजों के वार्ड, ओपीडी और ऑपरेशन थियेटर सब अलग-अलग बनाए गए हैं। यह हालात...

Jan 16, 2020, 06:50 AM IST
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छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में मरीजों के वार्ड, ओपीडी और ऑपरेशन थियेटर सब अलग-अलग बनाए गए हैं। यह हालात भूतल से लेकर तीसरी मंजिल तक बनी हुई है। सर्जरी और ईएनटी विभाग को छोड़ दें तो लगभग हर वार्ड में मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है। हड्‌डी, आंख और बच्चों के वार्ड में सबसे ज्यादा परेशानी है। क्योंकि अर्थोपेडिक की जांच पहली मंजिल पर होती है। और ऑपरेशन चौथे माले पर। आखों की जांच तीसरे माले पर होती और मरीजों को भूतल के वार्ड में शिफ्ट किया जाता है। ऐसा ही कुछ हाल टीबी चेस्ट विभाग के पेशेंट का है। जांच तीसरी मंजिल पर हो रही और मरीजों को भर्ती भूतल में ही कराया जा रहा। इससे यहां मरीजों को कई तरह की दिक्कतें हो रही हैं। मरीज और परिजन कई बार डॉक्टरों से इसे लेकर बात कर चुके हैं। पर प्रबंधन का हवाला देकर कोई भी डॉक्टर अपने वार्ड को व्यस्थित कराने पर ध्यान नहीं दे रहा है।

इसके अलावा अस्पताल की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में बने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से भी खराब होती जा रही है। यहां कई तरह की जांच बंद पड़ी है। स्पाइनल कार्ड डिसीज के मामले में एमआरआई जांच बेहद जरूरी है। एमआरआई मशीन से डायग्नोसिस के बाद ही बेहतर इलाज हो सकता है। यह सुविधा सिम्स में नहीं है। मशीनें बंद होने के कारण यूरिया, बिलरूबिन, प्रोटीन, शुगर, स्पेशल, उथाइराइड, ब्लड, यूरिक एसिड, आयरन, कैल्सियम, प्रोटीन, केलेस्ट्राल, पोटेशियम, ग्लूकोज, एसजीओटी समेत अन्य जांच नहीं हो पा रही है। ग्लूकोमा जांचने की कोई सुविधा नहीं है। घंटों लाइन में लगकर पर्ची कटाने के बाद जब आप चिकित्सक से मिलेंगे तो जवाब होगा अस्पताल में इसकी सुविधा नहीं। बाहर जांच कराना मजबूरी होगी। जांच के अलावा मरीजों को उन सुविधाओं के लिए भी भटकाव की स्थिति है। जिसके लिए अस्पताल बनवाया गया है। यहां आॅपरेशन थियेटर, ओपीडी और वार्ड तीनों ही अलग-अलग बने हैं। कहा जा रहा है कि डॉक्टरों के रसूख के हिसाब से उन्हें वार्ड का अावंटन हुआ है। डीन पीके पात्रा कुछ भी कहने से बच रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि अफसर मरीजों की परेशानी को लेकर गैरगंभीर हैं।

मेडिकल कॉलेज में अराजकता -2
आशीष दुबे | बिलासपुर

छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में मरीजों के वार्ड, ओपीडी और ऑपरेशन थियेटर सब अलग-अलग बनाए गए हैं। यह हालात भूतल से लेकर तीसरी मंजिल तक बनी हुई है। सर्जरी और ईएनटी विभाग को छोड़ दें तो लगभग हर वार्ड में मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है। हड्‌डी, आंख और बच्चों के वार्ड में सबसे ज्यादा परेशानी है। क्योंकि अर्थोपेडिक की जांच पहली मंजिल पर होती है। और ऑपरेशन चौथे माले पर। आखों की जांच तीसरे माले पर होती और मरीजों को भूतल के वार्ड में शिफ्ट किया जाता है। ऐसा ही कुछ हाल टीबी चेस्ट विभाग के पेशेंट का है। जांच तीसरी मंजिल पर हो रही और मरीजों को भर्ती भूतल में ही कराया जा रहा। इससे यहां मरीजों को कई तरह की दिक्कतें हो रही हैं। मरीज और परिजन कई बार डॉक्टरों से इसे लेकर बात कर चुके हैं। पर प्रबंधन का हवाला देकर कोई भी डॉक्टर अपने वार्ड को व्यस्थित कराने पर ध्यान नहीं दे रहा है।

इसके अलावा अस्पताल की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में बने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से भी खराब होती जा रही है। यहां कई तरह की जांच बंद पड़ी है। स्पाइनल कार्ड डिसीज के मामले में एमआरआई जांच बेहद जरूरी है। एमआरआई मशीन से डायग्नोसिस के बाद ही बेहतर इलाज हो सकता है। यह सुविधा सिम्स में नहीं है। मशीनें बंद होने के कारण यूरिया, बिलरूबिन, प्रोटीन, शुगर, स्पेशल, उथाइराइड, ब्लड, यूरिक एसिड, आयरन, कैल्सियम, प्रोटीन, केलेस्ट्राल, पोटेशियम, ग्लूकोज, एसजीओटी समेत अन्य जांच नहीं हो पा रही है। ग्लूकोमा जांचने की कोई सुविधा नहीं है। घंटों लाइन में लगकर पर्ची कटाने के बाद जब आप चिकित्सक से मिलेंगे तो जवाब होगा अस्पताल में इसकी सुविधा नहीं। बाहर जांच कराना मजबूरी होगी। जांच के अलावा मरीजों को उन सुविधाओं के लिए भी भटकाव की स्थिति है। जिसके लिए अस्पताल बनवाया गया है। यहां आॅपरेशन थियेटर, ओपीडी और वार्ड तीनों ही अलग-अलग बने हैं। कहा जा रहा है कि डॉक्टरों के रसूख के हिसाब से उन्हें वार्ड का अावंटन हुआ है। डीन पीके पात्रा कुछ भी कहने से बच रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि अफसर मरीजों की परेशानी को लेकर गैरगंभीर हैं।

आंखों के ऑपरेशन तीसरी मंजिल पर, वहां से पैदल पहली मंजिल लाते हैं मरीज को

सर्जरी के बाद आंखों के मरीज को भूतल के वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा।

चौथी मंजिल पर हड्‌डी का आपरेशन, वार्ड भूतल पर

सिम्स में प्रवेश करने पर सबसे पहले भूतल में अर्थोपेडिक वार्ड और मनोरोग विभाग है। अथोपेडिक वार्ड को यहां बनाने का उद्देश्य अच्छा है। प्रबंधन की मंशा थी कि किसी तरह की दुर्घटना में सीधे चोटिल लोगों को नीचे ही इसका लाभ मिले। पर इसमें ऑपरेशन की व्यवस्था चौथे मंजिल पर की गई है। इससे उन मरीजों की परेशानी बढ़ जाती है जिन्हें चौथे माले तक जाना पड़ता है। मामूली चोट वाले तो इलाज कराकर लौट जाते हैं। पर ज्यादा गंभीर मरीजों को दिक्कत ही उठानी पड़ती है।

मरीजों के आंख का ऑपरेशन तीसरे माले पर किया जा रहा है।

पहली मंजिल में शिशुओं की जांच, नई बिल्डिंग में वार्ड

सिम्स की पहली मंजिल पर शिशुओं का ओपीडी है। इसके अलावा मेडिसिन और टीबी चेस्ट की ओपीडी भी यहीं बनाई गई है। यहां बच्चों और टीबी चेस्ट के मरीजों का वार्ड दूसरी जगह पर बना है। टीबी चेस्ट के मरीजों को सिम्स की पुरानी बिल्डिंग में इलाज के लिए रखा जाता है। वहीं शिशुओं के लिए पूरा सेटअप ही अलग है। उनके लिए नए वार्ड में भर्ती और जांच इलाज की सुविधा है। यहां से जांचने के बाद उन्हें दूसरी बिल्डिंग में भेजा जाता है।

मैं मंत्री और डीन दोनों से इस बात पर चर्चा करूंगा


आंखों की सर्जरी तीसरे माले पर, वार्ड एकदम नीचे गया

सिम्स के तीसरे माले पर आंख और स्कीन जांचने की सुविधा है। दाेनों की ओपीडी यहीं बनाई गई है। पर सबसे ज्यादा परेशानी आंखों के मरीजों को होती है। ओपीडी के बगल में ही माइनर ओटी की सुविधा है। पर जब इन्हें भर्ती करने की बारी आती है तो सबसे नीचे टीबी चेस्ट वार्ड के किनारे भेजा जाता है। डॉक्टर भी आंखों की सर्जरी के बाद ऑब्जर्वेशन और दूसरी चीजों के लिए नीचे ही आते हैं। मरीज इस व्यवस्था को गलत ठहराते हैं।

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