मन से छल-कपट को दूर करने पर ही मिलेगा बेहतर जीवन: गोपिकेश्वरी

Dhamtari News - रावणभाठा में चल रहे प्रवचन में पांचवे दिन गोपिकेश्वरी देवी ने कहा कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए शरणागति जरूरी है...

Jan 24, 2020, 07:25 AM IST
Nagri News - chhattisgarh news a better life will be achieved only by removing deceit from the mind gopikeshwari
रावणभाठा में चल रहे प्रवचन में पांचवे दिन गोपिकेश्वरी देवी ने कहा कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए शरणागति जरूरी है और शरणागति के लिए मन से छल कपट को दूर करना होगा। तभी ईश्वर मिलेंगे और जीवन सार्थक एवं बेहतर होगा। प्रवचन में शरणागति में बाधा बनने वाले विषयों के संबंध में बताते हुए उन्होंने कहा कि शरीर का समर्पण कर देना शरणागति नहीं है। उसको तो फिजिकल ड्रिल कहते हैं, भगवान के पास इसका कोई महत्व ही नहीं है। अधिकांश लोग यही करते हैं, खाली चमड़े का सर भगवान के आगे, गुरु के आगे झुकाते हैं। मुंह से खाली कह देते हैं, भगवान मैं आपकी शरण हूँ, त्वमेव सर्वं मम देव देव कहता है। वास्तव में यह शरणागति नहीं है। शरणागत तो मन व बुद्धि को होना है क्योंकि बुद्धि मन की सारथी है, मन इंद्रियों की सारथी है।

गोपिकेश्वरी देवी ने कहा जब बुद्धि ही भगवान और गुरु के प्रति शरणागत होगी, तब उसका निर्णय सही होगा। मन सही दिशा में चलेगा। शरणागति का मतलब कुछ ना करना है। यहां प्रश्न उठता है कि शरणागति में जब कुछ करना ही नहीं है तो फिर ऐसी सरल दिखने वाली शरणागति हमसे आज तक क्यों नहीं हुई? इस प्रश्न का उत्तर गोपिकेश्वरी देवी ने देते हुए बताया कि शरणागति में 3 तत्व बाधक हैं। इनमें सरलता का अभाव। दीनता का अभाव। भगवान कहते हैं, सरल बनो। सरल स्वभाव न मन कुटिलाई, भोला बच्चा जैसे होता है एकदम वैसे ही बनना है, लेकिन हमारे मन में तमाम तरह के अहंकार, झूठ, फरेब सब भरा है। किसी के आगे झुकने के लिए हम तैयार नहीं हैं। कोई कुछ कह दे तो सहन करने की शक्ति नहीं। यह कठोरता त्यागनी होगी। दूसरी बाधा है दुराव या छिपाव। तीसरी बाधा माया भाव है यानी लोकरंजन का भाव है। सबको यही बीमारी है।

संसार काम चाहता है, भगवान मन का प्यार

उन्होंने बताया कि हमको धोखा है कि संसार हमारा प्यार चाहता है। मन चाहता है, परंतु सत्य तो यह है कि संसार तो केवल हमारा काम चाहता है। अगर संसार वालों का काम हमने नहीं किया और उनसे कहें कि काम वाम क्या है, हमारा प्यार लो, तो वो हमें पागल कहेंगे। असल में तो भगवान ही ऐसे हैं जो कहते हैं कि तुम खाली मन मुझको दे दो, अपने मन का प्यार दे दो। भगवान को काम नहीं चाहिए हमारा, संसार स्वार्थी है उसे केवल हमारे काम से मतलब है। इसलिए यह गांठ बांध लेनी है कि मन का प्यार, समर्पण केवल भगवान में हो।

गोपिकेश्वरी

नगरी. रावणभाठा में चल रहे प्रवचन में पांचवें दिन कथा सुनती महिलाएं।

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