हत्या एक आकार की... पूरे नाटक में गांधी का नाम लिए बिना कह दी उनकी सारी बात

Dhamtari News - अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से ‘हत्या एक आकर की’ नाटक का मंचन धनकेशरी मंगल भवन में शुक्रवार को किया गया। इस साल...

Jan 18, 2020, 06:56 AM IST
Dhamtari News - chhattisgarh news murder of one size gandhiji39s name in the entire drama without saying everything
अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से ‘हत्या एक आकर की’ नाटक का मंचन धनकेशरी मंगल भवन में शुक्रवार को किया गया। इस साल गांधी जी की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। इसके तहत उन पर आधारित नाटक का आयोजन किया गया। ललित सहगल द्वारा लिखित नाटक परिकल्पना और निर्देशन अभिषेक और स्वप्निल ने किया है। इस नाटक में मंच और मंच के पीछे कमलेश कुमार बैरवा, निशांत कुमार, अनुर्जन शर्मा, योगेश सोनी, राजेश कुमार गुर्जर, निखिल शर्मा, सोमेश सोढा और विजय प्रजापति ने किरदार निभाया। सभी कलाकार और निर्देशक जयपुर से पहुंचे।

नाटक में चार लोग हैं, जो राजनैतिक असहमति के चलते 30 जनवरी 1948 को ‘उस’ की हत्या करना चाहते हैं, जिसके सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के ‘फालतू’, बल्कि ‘खतरनाक’ नारों ने हिन्दू राष्ट्र को कमजोर कर दिया है, जो ‘क्रांतिकारियों’ की आलोचना करता रहा है; जिसने मौत के डर पर विजय पा ली है, जनता पर ऐसा जादू कर दिया है कि उसे जान से मार कर ही चुप किया जा सकता है। ये चारों लोग अपने मिशन पर निकलने ही वाले हैं कि उनमें से एक को संदेह होने लगता है कि मिशन सही है या ग़लत? उसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हैं क्योंकि वह चाहता है कि किसी को प्राणदंड देने के पहले अपराध और दंड पर गंभीर विचार हो। आखिरकार तय होता है कि एक मुकदमे का अभिनय किया जाए। जिसे संदेह है, वह ‘उस अभियुक्त’ के वकील की भूमिका करे, जिसे गोली चलानी है वह ‘सरकारी वकील’ की, तीसरा साथी जज बने, और चौथा बाकी बचे सारे रोल निभाए। ‘वह’ सारे आरोपों का जवाब अपने तर्कों और तथ्यों के साथ देता है। उसके तर्कों के सामने बाकी लोगों के तर्क बौने पड़ जाते हैं। नाटक के अंत में, ‘उस’ की भूमिका निभा रहे पात्र के तर्कों का जब जबाव देते नहीं बनता, तो बाकी तीनों अपने हत्यारे मिशन पर निकल जाते हैं। थोड़ी देर बाद नेपथ्य से तीन गोलियां चलने की आवाज आती है। मंच पर अकेला छूट गया अभिनेता वेदना भरी आवाज में याद दिलाता है, ‘यह न तो पहली बार हुआ है न आखिरी बार। उसे बार-बार मारा गया है, बार-बार मारा जाएगा। ‘उसकी नहीं, तुमने केवल एक आकार की हत्या की है...मूर्ख’। ‘उस’ का मतलब नीरवता की आवाज, आपके अपने मानवीय विवेक की आवाज। गांधी की नियति एक व्यक्ति की नहीं, मानवीय विवेक की नियति है। साथ ही उनका ‘जिद्दीपन’ उस हरियाली का जिद्दीपन है, जो बड़ी से बड़ी चट्टानों के बीज अपनी मौजूदगी दर्ज करा ही देती है। मंच पर छूट गये साथी का आखिरी कथन, नाटक का भरत-वाक्य है, ‘उसने तो 1919 में ही कह दिया था कि उसके लिए इससे ज्यादा खुशी की कोई बात हो नहीं सकती कि उसके प्राण हिन्दू-मुसलिम एकता की राह पर जाएं। वह तो नाच रहा होगा खुशी से।

‘तुमने केवल एक आकार की हत्या की है मूर्ख...’

धमतरी. अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से ‘हत्या एक आकर की’ नाटक का मंचन शुक्रवार को धनकेशरी मंगल भवन में किया गया।

नाटक में चार लोग हैं, जो राजनैतिक असहमति के चलते 30 जनवरी 1948 को ‘उस’ की हत्या करना चाहते हैं, जिसके सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के ‘फालतू’, बल्कि ‘खतरनाक’ नारों ने हिन्दू राष्ट्र को कमजोर कर दिया है, जो ‘क्रांतिकारियों’ की आलोचना करता रहा है; जिसने मौत के डर पर विजय पा ली है, जनता पर ऐसा जादू कर दिया है कि उसे जान से मार कर ही चुप किया जा सकता है। ये चारों लोग अपने मिशन पर निकलने ही वाले हैं कि उनमें से एक को संदेह होने लगता है कि मिशन सही है या ग़लत? उसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हैं क्योंकि वह चाहता है कि किसी को प्राणदंड देने के पहले अपराध और दंड पर गंभीर विचार हो। आखिरकार तय होता है कि एक मुकदमे का अभिनय किया जाए। जिसे संदेह है, वह ‘उस अभियुक्त’ के वकील की भूमिका करे, जिसे गोली चलानी है वह ‘सरकारी वकील’ की, तीसरा साथी जज बने, और चौथा बाकी बचे सारे रोल निभाए। ‘वह’ सारे आरोपों का जवाब अपने तर्कों और तथ्यों के साथ देता है। उसके तर्कों के सामने बाकी लोगों के तर्क बौने पड़ जाते हैं। नाटक के अंत में, ‘उस’ की भूमिका निभा रहे पात्र के तर्कों का जब जबाव देते नहीं बनता, तो बाकी तीनों अपने हत्यारे मिशन पर निकल जाते हैं। थोड़ी देर बाद नेपथ्य से तीन गोलियां चलने की आवाज आती है। मंच पर अकेला छूट गया अभिनेता वेदना भरी आवाज में याद दिलाता है, ‘यह न तो पहली बार हुआ है न आखिरी बार। उसे बार-बार मारा गया है, बार-बार मारा जाएगा। ‘उसकी नहीं, तुमने केवल एक आकार की हत्या की है...मूर्ख’। ‘उस’ का मतलब नीरवता की आवाज, आपके अपने मानवीय विवेक की आवाज। गांधी की नियति एक व्यक्ति की नहीं, मानवीय विवेक की नियति है। साथ ही उनका ‘जिद्दीपन’ उस हरियाली का जिद्दीपन है, जो बड़ी से बड़ी चट्टानों के बीज अपनी मौजूदगी दर्ज करा ही देती है। मंच पर छूट गये साथी का आखिरी कथन, नाटक का भरत-वाक्य है, ‘उसने तो 1919 में ही कह दिया था कि उसके लिए इससे ज्यादा खुशी की कोई बात हो नहीं सकती कि उसके प्राण हिन्दू-मुसलिम एकता की राह पर जाएं। वह तो नाच रहा होगा खुशी से।

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