संसार में कोई भी किसी के अनुकूल नहीं हो सकता: गोपिकेश्वरी

Dhamtari News - रावणभाठा में चल रहे प्रवचन में छटवें दिन शुक्रवार को गोपिकेश्वरी देवी ने संसार के स्वरूप के संबंध में समझाया।...

Jan 25, 2020, 07:20 AM IST
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रावणभाठा में चल रहे प्रवचन में छटवें दिन शुक्रवार को गोपिकेश्वरी देवी ने संसार के स्वरूप के संबंध में समझाया। उन्होंने कहा कि संसार में कोई भी किसी के अनुकूल नहीं है। उसे अनुकूल बनाना पड़ता है या उसके अनुकूल बनना पड़ता है। उन्होंने संसार के संबंध में बताया कि संसरतीति संसारः यानी जो निरंतर सरकता जाय, परिवर्तनशील हो वही संसार है। इस विषय में दो अवधारणाएं हैं। एक भौतिकवादी और आध्यात्मवादियों की अवधारणा है। भौतिकवादी इसे उन्नतशील मानते हैं और आध्यात्मवादी इसे नीचे की ओर जाता हुआ बताते हैं। दोनों ही सही हैं। भौतिकता की दृष्टि से अतीत और वर्तमान में बहुत अंतर है किंतु आध्यात्म और संस्कार की दृष्टि से यह पतन की ओर जा रहा है, पृथ्वी पर दिनोंदिन पाप की बढ़ोतरी हो रही है। भौतिकता के हिसाब से प्रगति हो रही है। आध्यात्मिक दृष्टि से अवनति हो रही है।

उन्होंने कहा कि आदि जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य जी ने इस संसार को मिथ्या कहा और उनके बाद के तीन मौलिक जगद्गुरुओं ने इसे सत्य कहा। जगद्गुरु श्रीकृपालु महाराज ने इसका समन्वय करते हुए समझाया है कि संसार सत्य और मिथ्या दोनों है। पृथ्वी, तारे, नदी, जीव-जंतु जो स्थूल संसार हम अपनी आंख से देखते हैं वह भगवान का बनाया हुआ सत्य संसार है। भगवान सत्य है। उसकी बनाई कोई चीज मिथ्या नहीं हो सकती। इस संसार पर हम अपने मन में मैं-मेरा का जो भाव बनाते हैं, हमारे मन का बनाया वह मायिक संसार असत्य या मिथ्या संसार है। हमको इसी मिथ्या संसार से वैराग्य करना है क्योंकि अनंतकाल से इसी ने हमें 84 लाख योनियों में घुमाया है।

स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करते हैं तारीफ: गोपिकेश्वरी देवी ने बताया कि प्रत्येक जीव जो ईश्वर से दूर है वह माया के 3 निरंतर परिवर्तनशील गुणों के अधीन है। इन गुणों के अनुसार ही उसकी प्रवृत्ति होगी। इस कारण कोई किसी के अनुकूल नहीं हो सकता है। ये गुण परिवर्तनशील रहते हैं। सब एक दूसरे से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए एक दूसरे की तारीफ करते हैं।

नगरी. संसार के स्वरूप पर प्रवचन सुनने के लिए शुक्रवार को उपस्थित नगरवासी।

कोई किसी के सुख के लिए कुछ नहीं कर सकता

संसार की व्याख्या करते हुए गोपिकेश्वरी देवी ने कहा कि जीव खुद ही आनंद प्राप्ति के लक्ष्य के लिए प्रय|शील है। जब तक वह उसे प्राप्त नहीं कर लेता वह दूसरे के सुख के लिए कुछ नहीं कर सकता। अगर कोई कुछ करने का दावा करे तो आंतरिक रूप से वह अपने ही सुख के लिए होगा। विश्व में बिना ईश्वर की प्राप्ति के कोई किसी से प्रेम नहीं कर सकता। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए प्रेम का नाटक ही किया जाता है। ऐसे संसार से समझदारी पूर्वक वैराग्य करके उस भगवान के प्रति अनुराग करना चाहिए जो हमारा वास्तविक हितैशी है।

गोपिकेश्वरी

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