संगम में स्नान करने के बाद किया दान

Jashpuranagar News - भास्कर संवाददाता | जशपुरनगर मकर संक्रांति पर बुधवार की सुबह से ही नदियों के संगम में स्नान-ध्यान करने वाले...

Jan 16, 2020, 07:10 AM IST
Jashpur News - chhattisgarh news donated after bathing in sangam
भास्कर संवाददाता | जशपुरनगर

मकर संक्रांति पर बुधवार की सुबह से ही नदियों के संगम में स्नान-ध्यान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। श्रद्धालुओं ने सोगड़ा के चड़िया के पवित्र संगम तट के साथ लावाकेरा के ईब नदी एवं अन्य नदी के तटों पर स्नान एवं पूजा-अर्चना कर यथासंभव अन्न, धन, वस्त्र, तिल आदि का दान किया।

मकर संक्रांति के बारे में पं. मनोज रामांकात मिश्र ने बताया कि हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन दक्षिणायन अवधि को देवताओं की रात्रि या नकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। जबकि उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन माना गया है। इसलिए मकर संक्राति के दिन दान, तप, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक कार्याें का महत्व बढ़ जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन सरोवर, जल कुंडों के पवित्र जल में सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पुण्य लाभ के साथ मोझ व स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसी मनोकामनाओं के साथ बुधवार की सुबह से ही श्रद्धालुओं ने संगम तटों एवं सरोवरों में डुबकियां लगा कर पवित्र स्नान किया।

चड़िया के संगम में मिलता है प्रयाग का पुण्य

ग्राम चड़िया के पास स्थित तीन नदियों के संगम स्थल पर मकर संक्राति के दिन स्नान करने पर वही पुण्य प्राप्त होता है, जो प्रयाग में होता है। रामप्रकाश पांडेय ने बताया कि नदी के तट जहां पर तीन नदियांं लावा, ईब और मधेश्वर का संगम है, वहां बाबा अवधूत भगवान अवधूत श्रीराम ने तट पर तप-हवन आदि कर उसे जागृत कर प्रयाग संगम तट के समकक्ष बनाया।

खूब हुई तिलकुट की बिक्री

मकर संक्राति में तिल का विशेष महत्व रहता है। इस दिन लोग घरों में तिल के लड्डू एवं तिलकुट बनाते हंै। ऐसी मान्यता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई थी। मकर संक्रांति पर दुकानों में तिल की मिठाइयां एवं तिलकुट की खूब बिक्री हुई।

पुराने रिवाजों काे निभाया

पत्थलगांव | मारवाड़ी समाज के लोगों ने मकर संक्रांति की सुबह लोहड़ी की आग जलाकर उसमें बुराइयों का त्याग के अलावा पुराने रिवाजों को निभाया। दरअसल मारवाड़ी समाज द्वारा मकर संक्रांति की सुबह आग जलाकर उसकी तपन महसूस करने के पीछे कई पुरानी परंपरा है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन लोग नदियों में स्नान कर घर को लौटते थे। उन्हें ठंड से बचाने के लिए पहले से ही घर के लोग आग जलाकर रखे थे। तब से मारवाडी समाज के लोग संस्कृति के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सुबह घर के बाहर आग जलाते हैं।

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