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बेमौसम बारिश से महुआ, चिरौंजी का उत्पादन कम
बेमौसम बारिश की वजह से इस वर्ष जिले में वनोपज की आवक बाजार में नहीं हो रही है। मार्च के महीने में हर साल महुआ सहित अन्य वनोपजों की आवक शुरू हो जाती थी। पर इस वर्ष गल्ला व्यापारी दुकान लगाकर आवक का इंतजार कर रहे हैं। वनोपज की आवक नहीं होने का बड़ा असर जिले के व्यापार पर पड़ेगा। क्योंकि चार, महुआ, धवई, बेहरा ऐसे वनोपज हैं जिसकी बाहरी बाजार में अच्छी खासी डिमांड है और कई दवा कंपनियों में यहां के वनोपज कच्चे माल के तौर पर भेजे जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर 50 करोड़ से अधिक का वनोपज व्यापारियों के माध्यम से बाहर
भेजा जाता है।
महुआ जिले के प्रमुख वनोपज में से एक है। आदिवासी बहुल जशपुर जिले में आदिवासियों को शराब बनाने की छूट है। आदिवासियों के कई तीज त्यौहार व शादी ब्याह में महुए का उपयोग भारी मात्रा में होता है। इसके अलावा यहां संग्रहित महुए को बाहर की मंडियों में भेजा जाता है। महुआ चुनने के लिए ग्रामीणों की दिनचर्या में बदलाव आ जाता है। ग्रामीण सुबह 3 बजे से महुआ संग्रहण के काम में जुट जाते हैं। बार-बार हो रही बारिश से महुआ के पेड़ों में फूल नहीं लग पाए हैं। महुआ की खरीदी से हजारों व्यापारी जुड़े हैं। जो गांव-गांव में पहुंचकर गल्ला लगाकर महुआ की खरीदी करते हैं। इसकी कीमत 40 रुपए किलो तक होती है।
तीन राज्यों से एक साथ बड़ा कारोबार
जिले में उत्पादित महुए का व्यापार विशेष रूप से जिले से लगे तीन राज्यों में देखने को मिलता है और इसका मूल्य भी मांग और पूर्ति के सिद्घांत के अनुरूप तय होता है। कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण ग्रामीण संग्रहित महुआ का भंडारण नहीं कर पाते हैं और इसे सुखाकर व्यापारियों को बेच देते हैं। वर्तमान में यही कारण है कि व्यापारियों को ऊंचा भाव मिल जाता था। जिले का महुआ छग सहित झारखंड और ओडिशा में बिकता है। क्षेत्र में महुए की सबसे बड़ी मंडी झारखंड की राजधानी रांची है और सबसे अधिक खपत वाला क्षेत्र भी झारखंड है। महुए का बाजार लगभग पूरी तरह झारखंड पर ही निर्भर करता है। व्यापारी गोपाल सोनी ने बताया कि इस साल महुआ का कारोबार ठप रहेगा।
12 सौ रुपए किलो बिकने वाला चिरौंजी भी गायब
इस वर्ष चिरौंजी का संग्रहण भी नहीं हो पा रहा है। क्योंकि चिरौंजी के फल नहीं आ पाए हैं। क्षेत्र में ग्रामीण संग्राहक चिरौंजी के फल का संग्रहण करते हैं और उसे सुखाकर उसका बीज निकालते हैं। चिरौंजी जिसे एक समृद्ध पोष्टिक आहार माना जाता है, बाजार में उसकी कीमत 12 सौ रुपए प्रतिकिलो है। हालांकि ग्रामीण संग्राहकों को चिरौंजी के बीज की उतनी कीमत नहीं मिलती है। संग्राहक इसे औने-पौने दाम में ही व्यापारियों को बेचते थे।
ग्रामीणों की अतिरिक्त आय का जरिया है वनोपज
आदिवासियों की आय का प्रमुख जरिया वनोपज ही है। इस वर्ष किसी भी वनोपज के नहीं होने से ग्रामीण निराश हैं। क्योंकि इस अतिरिक्त आमदनी से ग्रामीण अपनी जरूरत की कई चीजें पूरी करते हैं। व्यापारी भी इस वर्ष निराश हैं।