बाहर नहीं गए क्योंकि नाम से ज्यादा कांकेर से प्यार था, वहीं भुला दिए गए अशरफ अली

Kanker News - अ शरफ अली...70-80 के दशक में मुशायरों व कवि सम्मेलनों के लिए रचा-बसा नाम। कांकेर के प्रैक्टिसिंग स्कूल में 1970 से 1995 तक पढ़ा...

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 07:07 AM IST
Kanker News - chhattisgarh news did not go out because kanker loved more than name but ashraf ali was forgotten
अ शरफ अली...70-80 के दशक में मुशायरों व कवि सम्मेलनों के लिए रचा-बसा नाम। कांकेर के प्रैक्टिसिंग स्कूल में 1970 से 1995 तक पढ़ा चुके अशरफ अली उम्दा संगीतकार, शायर के साथ हिन्दी के कवि भी थे। बादलों पर लिखी उनकी कविता ’अजाने देश से फिर आ गए बादल क्षितिज पर अनमने से छा गए बादल’ पढ़कर ख्यातिलब्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने अली को पत्र लिखा। बच्चनजी ने लिखा था कि बादलों पर ढेरों कविताएं पढ़ीं, मगर ऐसे भाव पढ़ने को नहीं मिले थे। शहर के एक मदरसे में पढ़ा रहीं उनकी बेटी शम्स अली कहती हैं कि पिताजी यदि कांकेर से बाहर जाते तो काफी नाम कमा सकते थे, उनके समकालीन साथी उन्हें बाहर जाने के लिए कहते भी थे, लेकिन वे यही जवाब देते थे कि उन्हें शोहरत से ज्यादा कांकेर की आबो-हवा से प्यार था।

कांकेर से इतना गहरा जुड़ाव रखने वाले कवि को आज उनके शहर ने ही पूरी तरह भुला दिया है। जिस स्कूल में उन्होने 25 साल अपनी सेवाएं दीं। वहां, वर्तमान में पढ़ने वाले छात्र तक उन्हें नहीं जानते। 1935 में जन्मे अशरफ अली का निधन 15 मई 1996 को हुआ था। बांसुरी, हारमोनियम, तबला, वायलिन बजाने के अलावा कविता लिखते तथा क्रिकेट खेलने के शौकीन थे। काष्ठकला में भी वे पारंगत थे। स्कूल की छात्रा जिया यादव, नम्रता यादव, प्रिया पटेल ने कहा अशरफ अली सर के बारे में वे कुछ नहीं जानते। पुराने छात्र रह महादेव वार्ड के नईम खान की आंखें अशरफ अली का नाम सुनकर चमक उठीं, तुरंत बोलें कि सर उन्हे पढ़ा चुके हैं। गर्व है कि उनसे हमें पढ़ने का मौका मिला। नईम ने कहा कि उस समय गूगल, इंटरनेट का दौर भी नहीं था। इसलिए सर के हुनर और उनकी रचनाओं को भुला देने में समय भी नहीं लगा।

ये कविता किसी सर्च इंजन या सोशल मीडिया पर उपलब्ध नहीं है। हम इसे मरहूम अशरफ अली के परिवार की इजाजत से भास्कर के पाठकों लिए प्रकाशित कर रहे हैं। इस कविता को पढ़कर बच्चनजी ने पत्र लिखकर कहा था- बादलों पर आज तक ऐसी कविता नहीं पढ़ी थी।

अजाने देश से फिर आ गए बादल।

क्षितिज पर अनमने से छा गए बादल।

अजन्मी प्रीति से भरमा गए बादल।

किसी के केश का उपमान बनना था,

कि श्यामल रूपले लहरा गए बादल।

संजोए कौन रखता है किसी का छल?

तड़पता कौन इकतरफा यहां प्रतिपल ?

मगर इकचाह का सम्मान करना था,

(किसी की चाह का सम्मान करना था)

नयन की कोर से टकरा गए बादल।

उखड़ते पांव हैं, आस्था यहाँ दुर्बल,

पतन, विघटन, घुटन, टूटन, तपन अविकल,

पुनर्निर्माण का प्रतिमान बनना था,

बिखर कर फिर जुड़े गहरा गए बादल।

अजाने देश से फिर आ गए बादल।

- अशरफ अली

बादल

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