बख्शीजी का निबंध पढ़ने वाले छात्र तो दूर शिक्षक भी नहीं जानते कि वो वहीं पढ़ाते थे

Kanker News - हि न्दी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कांकेर के नरहरदेव स्कूल में पढ़ाते थे। उनका निबंध क्या...

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 07:07 AM IST
Kanker News - chhattisgarh news even the students who read bakshi39s essay do not know that they used to teach there
हि न्दी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कांकेर के नरहरदेव स्कूल में पढ़ाते थे। उनका निबंध क्या लिखूं आज भी 12वीं कक्षा के पाठयक्रम में पढ़ाया जाता है, जिसे उन्होने कांकेर में रहने के दौरान ही लिखा था। विडंबना यह है कि नरहरदेव स्कूल में पढ़ रहे छात्र ही नहीं जानते यह जगह बख्शीजी की कर्मस्थली रही थी।

खैरागढ़ में जन्मे प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने 1929 से 1930 दो वर्ष तक नरहरदेव स्कूल (पूर्व नाम कार्फड स्कूल) में पढ़ाया था। तब कांकेर रियासत के राजा कोमलदेव थे। इतिहासकार मो. इस्माइल ने बताया कि बख्शीजी राजापारा वार्ड के जिस मकान में रहते थे वहां आज भी ऊपर लिखा है 18वीं सदी का राजमहल। वे हिन्दी व अंग्रेजी दोनों पढ़ाते थे। कांकेर में ही उन्होने प्रसिद्ध निबंध क्या लिखूं के अलावा दो कहानियां परी का परिचय व झलमला लिखी थी। दूधनदी तट की एक चट्टान पर बैठकर बख्शीजी घंटों लिखते-पढ़ते थे, उसे बाद में लोग बख्शी शिला पुकारने लगे। गिट्टी तोड़ने वालों ने इस चट्टान को ही तोड़कर नष्ट कर दिया।

नरहरदेव स्कूल में बख्शीजी की स्मृति संजोना ताे दूर स्कूल प्रबंधन के पास उनके कांकेर में अध्यापन करने का रिकाॅर्ड तक नहीं है। भास्कर ने पड़ताल करवाई तो कुछ चंद शिक्षकों को ही जानकारी है कि बख्शीजी यहां पढ़ाया करते थे। छात्रों को तो इसका अंदाज तक नहीं है। 12वीं के छात्र भोजराज साहू, हेमेंद्र साहू, खिलेश नेताम, छात्रा भानुप्रिया वट्टी, सिमरन वट्टी, हेमिका तारम, राधिका कश्यप, करीना देहारी ने कहाकि 12वीं में बख्शीजी का निबंध है, जिसे वे पढ़ते हैं। लेकिन वे इस स्कूल में पढ़ाते थे। यह जानकारी किसी ने नहीं दी।

हिन्दी की शिक्षिका नीलमणि दीक्षित ने कहा कि बख्शीजी यहां पढ़ा चुके हैं, यह जानकारी उन्हें भी नहीं थी। शिक्षिका शशि सजोरिया कई वर्षों से यहां पढ़ा रहीं लेकिन उन्हें भी इस बारे में नहीं पता था। साहित्यकार 83 वर्षीय बहादुरलाल तिवारी कहते हैं कि यह गौरव की बात है कि बख्शीजी इस शहर में रहे, मगर इसकी जानकारी सिर्फ साहित्य से जुड़े लोगों को ही है। आज की पीढ़ी को इसकी जानकारी तक नहीं है। जो बीत गई सो बात गई लेकिन कम से कम अब उनकी स्मृतियों को संजोने की पहल होनी चाहिए।

राजापारा स्थित मकान जहां रहते थे बख्शी जी।

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