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यहां तेरस तक मनाते हैं फागुन उत्सव

एक वर्ष पहले
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कबीरधाम जिले के बैगा-अादिवासियों की होली अनोखी होती है। यहां के बैगा-आदिवासी समुदाय के लोग तेरस तक होली मनाते हैं। इस दौरान बैगा युवक-युवतियां एक-दूसरे के गांव में जाते हैं। फागुन उत्सव मनाते हैं और नृत्य करते हैं, जिसे स्थानीय लोग खेखड़ा नृत्य कहते हैं।

खास बात यह है कि नृत्य के दौरान पुरुष और महिला दल की प्रमुख चेहरे पर मुखौटा पहने रहते हैं। पुरुष मुखौटे को खेखड़ा और महिला के मुखौटे को गिजजी कहते हैं, जो जंगल के सेमर लकड़ी को आकृति देकर बनाते हैं। 3 खाट को जोड़कर हाथी की आकृति बनाई जाती है, जिस पर पुरुष दल का प्रमुख बैठता है। टोली के बाकी सदस्य मांदर व अन्य वाद्य यंत्र बजाते हुए नृत्य करते हैं। फागुन नृत्य का यह सिलसिला तेरस तक चलता है।

होली विशेष

कबीरधाम जिले के बैगा आदिवासी एक-दूसरे के गांव में पहुंचकर लकड़ी का मुखौटा पहन मांदर बजाते हुए करते हैं खेखड़ा नृत्य

मुखौटे को पहनकर करते हैं नृत्य।

टेसू के फूल को सुखाकर खुद तैयार करते हैं गुलाल, उसी से खेलते हैं होली: वनांचल गांवों में रहने वाले ये बैगा-आदिवासी हर्बल होली खेलना पसंद करते हैं। इलाके के जंगलों से पलाश (टेसू) के फूल तोड़कर धूप में सुखाते हैं और फिर उसे पिसकर गुलाल बनाते हैं। महीनेभर पहले ही शुरू हो जाती है। इसी रंग से होली खेली जाती है। बैगा-आदिवासी 13 दिन तक यानि तेरस तक होली उत्सव मनाते हैं।

हर त्योहार के लिए अलग-अलग नृत्य व गीत: बैगा समाज के जिला प्रमुख इतवारी मछिया बताते हैं कि जनजातियों में हर त्योहार के लिए अलग-अलग नृत्य व गीत है। खेखड़ा नृत्य भी उन्हीं में से एक है, जो फागुन में किया जाता है। इन दिनों पंडरिया अंचल के ग्राम तेलिया पानी लेदरा, तेलियापानी धोबे, बाकी, केशमर्दा, रुख्मीददर समेत अन्य बैगा बाहुल गांवों में यह नृत्य देखने को मिलेगा।

इस दौरान घेरदार घाघरा पहनते हैं पुरुष नर्तक

फागुन नृत्य बिना श्रृंगार के नहीं होता। शृंगार करके ही बैगा युवक-युवतियां नृत्य करते हैं। जिसने शृंगार नहीं किया, उसे नृत्य में शामिल नहीं किया जाता। महिला और पुरुषों का अपना-अपना श्रृंगार होता है। पुरुष घेरदार घाघरा पहनते हैं। साथ ही कमीज सलूखा और काली जाकेट। सिर पर पगड़ी और उसमें मोर पंख की कलगी, गले में विभिन्न रंगों की मालाएं पहनते हैं। सभी के हाथों में ठिसकी (वाद्य यंत्र) रहता है। बैगा महिलाएं श्रृंगार प्रिय होती है और नृत्य के लिए अधिक सज-संवरकर पहुंचती हैं। मुंगी धोती धारण करती हैं। जूड़े में मोर पंख की कलगी पहनती हैं।

कवर्धा. खेखड़ा नृत्य करते बैगा युवक-युवतियां, खाट को बांधकर बनाए गए हाथी पर सवार होकर करते हैं नृत्य।
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