गजल, रूबाई जैसे आयातित छंदों से अलग है हिंदकी छंद: डॉ. मणिक

Korba News - एनटीपीसी के रिटायर्ड भू-उपमहाप्रबंधक (पर्यावरण प्रबंधन) डॉ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग अपनी रचनाओं को लेकर तो...

Sep 14, 2019, 07:13 AM IST
एनटीपीसी के रिटायर्ड भू-उपमहाप्रबंधक (पर्यावरण प्रबंधन) डॉ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग अपनी रचनाओं को लेकर तो प्रसिद्ध हैं। वे अपने एक विशिष्ट शोध कार्य के लिए भी खास स्थान रखते हैं।

डॉ. विश्वकर्मा ने सन 1990 के आसपास सिद्ध सरहपा द्वारा अंत्यानुप्रास/तुकांत परंपरा को शुरुआत की आधार मानकर हिंदकी गजल पर विशिष्ट शोध किया है। इसी पर आधारित उन्होंने हाल ही में उनके संपादन में हिंदी गजलों के संग्रह हिंदकी का प्रकाशन हुआ है। जिसमें 39 प्रमुख रचनाकारों की गजलें शामिल हैं। इनका आधार हिंदकी छंद ही माना गया है।

एनटीपीसी की करीब साढ़े तीन दशक की सेवा के बाद वे पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। गजल संग्रह, गीत संग्रह, दोहा व मुक्तक, छत्तीसगढ़ी गीतों का संग्रह सहित नवरंग की कुंडलियां आदि अनेक रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। वे प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित साहित्य, कवि सम्मेलन व परिचर्चा में भी भाग लेते रहे हैं। भाेपाल में आयोजित 10 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी भागीदारी रही है। वहीं अनेक प्रमुख समाचार पत्रों में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। वे 100 से अधिक विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए गए हैं। उनकी विशिष्ट पहचान हिन्दी गजल का इतिहास एवं नवछंद विधान हिंदकी के प्रवर्तक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर है। वे कोरबा साहित्य समिति के संरक्षक, प्रदेश साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष सहित विभिन्न संस्थाओं के प्रमुख पदों पर कार्यरत रहे हैं।

उनका कहना है कि छंदों की उत्पत्ति वेदों से हुई है और वेद लगभग 11 हजार वर्ष पुराने हैं। विभिन्न भाषाओं में लिखा जा रही गजलों को पहचान देने के लिए इसका प्रयोग जरूरी है। डॉ. नवरंग ने कबीर, रहीम, भारतेन्दु हरीशचंद्र एवं निराला का हवाला देते हुए हिन्दी गजल लेखन के लिए नए छंद की रचना करके उसे हिंदकी नाम दिया है। वे इसका उद्देश्य हिन्दी एवं आम बोलचाल की भाषा में लिखी जा रही गजलनुमा रचनाओं को हिंद की छंद के रूप में मान्यता दिलाना, बढ़ावा देना एवं हिन्दुस्तान में उर्दू गजलों से अलग नई पहचान दिलाना है।

छंदों की उत्पत्ति वेदों से, लगभग 11 हजार वर्ष पुराने

हिंदकी पूरी तरह हिंदुस्तानी और भारतीय छंद है

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व जिलाध्यक्ष रह चुके डॉ. नवरंग ने कहा कि हिंदकी छंद बाहर से आए छंदों जैसे रूबाई, गजल, मुक्त छंद, नवगीत, प्रयोगवादी कविता या हाईकु से अलग हैं। यह पूरी तरह हिंदुस्तानी व भारतीय छंद है। यह मात्रिक छंद की वह विधा है जिसमें 4 से अधिक पद होते हैं। प्रथम युग्म तुकांत है एवं शेष युग्म के दूसरे पद का तुक पहले के दोनों पदों के तुक से मिलता है। युग्मों की न्यूनतम संख्या तीन व अधिकतम संख्या सुविधानुसार कितनी भी बढ़ाई जा सकती है।

जापान में सभी सरकारी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं, हमारे यहां निजी में अच्छी शिक्षा

एमबीए कर रहे अणुव्रत जैन ने जापान से रिसर्च कर लौटने के बाद सुनाए अपने अनुभव, हिन्दी भाषा का उपयोग करने दिया जोर

कोरबा| भिलाई में एमबीए की पढ़ाई कर रहे छात्र अणुव्रत जैन ने जापान से रिसर्च कर लौटने के बाद शुक्रवार को तिलक भवन में अपने अनुभव बताए। उन्होंेने कहा कि किसी भी देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा गरीबी है। इसे कैसे दूर किया जाए इसके लिए मैं अध्ययन करने जापान गया था। जापान जैसे विकसित देश की प्रगति का मूलमंत्र वहां गरीबी का न होना है। उन्होंने बताया कि जापान में पहले गरीबों को सम्मान मिला। इसके बाद उच्च शिक्षा दी गई। फिर एक समय ऐसा आया कि गरीब अमीर होते गए। हमारे देश में विकास की गति धीमी होने का दोष सरकारों को दिया जाता है। लेकिन चुनाव में लोग विकास के मुद्दे पर वोट नहीं देते। वोट इसलिए नहीं देते क्योंकि उन पर धनबल हावी होता है। इसका मुख्य कारण अशिक्षा है। अच्छी शिक्षा निजी शैक्षणिक संस्थाओं से मिलती है। इसके लिए धन चाहिए। गरीब बाहुल्य भारत में गरीबों के लिए संभव नहीं है। अणुव्रत ने बताया कि इसके विपरीत जापान में हर कोई अमीर तबके का छात्र भी सरकारी शैक्षणिक संस्थानाें में पढ़ना चाहता है। उन्होंने जापान के परिप्रेक्ष्य में भारत में गरीबी दूर करने के सवाल पर कहा कि भारत के ग्रंथों में ही समाहित है। वह मूलमंत्र है कर्मों पर विश्वास। इसका तात्पर्य स्वयं का बर्ताव अच्छा होने से है। यदि हम अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं हमें दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना होगा। गरीबों को हम सिर्फ पैसा देकर गरीबी नहीं हटा सकते। जापान के लोग सबको एक समान समझते हैं। वहां हुनर के ऊपर कोई अमीर-गरीब नहीं है। जापान में गरीबी न होने और अच्छी शिक्षा होने के कारण वहां के लोगों में साफ-सफाई, सेहत, पर्यावरण व राष्ट्रवाद जैसे अनेक अच्छाईयों का समावेश है। कक्षा 10 वीं के बाद शिक्षा में अनेक विषयों के विकल्प मौजूद हैं। इस वजह से वहां हर तरह के जॉब हैं। बेरोजगारी लगभग शून्य है। वहां के लोगों को अनेक प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। 1945 अमेरिका ने अणुबम गिराए। 2011 में सुनामी के साथ ही भूकंप से तबाही हुई। इसके बाद भी जापान मजबूती से खड़ा हो जाता है। इसका मुख्य कारण वहां के लाेगों में एकता, निष्ठा व शानदार आपदा प्रबंधन मुख्य है। अणुव्रत पत्रकार प्रेमचंद जैन के पुत्र हैं।

अाज हिंदी की गिनती एक, दो पर इंग्लिश के वन और टू पड़ रहे हैं भारी

हिंदी देश के लोगों को आपस में जोड़ने वाली भाषा, आज के युवा भी कह रहे- इंग्लिश मीडियम के दौर में पिछड़ रही हिंदी

कोरबा| हिंदी देश की मातृ भाषा होने के कारण यह देश के अलग-अलग प्रांत के लोगों के बीच संवाद कायम करने का प्रमुख माध्यम भी है। हिंदी भाषा देश में लोगों को आपस में जोड़ती है। लेकिन आधुनिक दौर में लोग हिंदी भाषा की बेहतर ज्ञान व जानकारी से दूर हो रहे है। क्योंकि इंग्लिश मीडियम के इस दौर में हिंदी को सिर्फ बोलचाल का माध्यम ही समझ लिया गया है। आज के युवा भी मानते हैं कि उनके हिंदी का शब्द ज्ञान ठीक नहीं है। अब तो अचानक अगर कोई हिंदी की गिनती के दौरान अठहत्तर, उन्यासी बोल दे तो इसे समझने में कुछ देर के लिए उलझन हो जाती है। छोटे-स्कूली बच्चों में भी हिंदी की गिनती एक और दो पर वन और टू भारी पड़ रहे हैं। क्योंकि स्कूलों में बेहतर शिक्षा के नाम पर इंग्लिश के ज्ञान पर जोर दिया जा रहा हैं, चाहे वह शब्दों का ज्ञान हो या फिर आंकड़ों का। इस तरह हिंदी भाषा का ज्ञान पीछे छूटता जा रहा है। शहर के कालेज में पढ़ाई करने वाले युवा भी वे खुद में यह कमी देखते हैं।

हिंदी दिवस को लेकर जानकारी नहीं, कारण प्रचार-प्रसार में है कमी: राहुल

रजगामार में रहने वाले छात्र राहुल चौहान (19) का कहना है कि उसको हिंदी दिवस को लेकर ठीक से जानकारी नहीं है। इसके पीछे कारण हिंदी भाषा व इससे जुड़े आयोजनों के प्रचार-प्रसार में कमी को मानते हैं। राहुल का कहना है कि घर में और दोस्तों के साथ हिंदी में बात करते हैं। लेकिन बोलने में गल्तियां कर जाते हैं।

पुराने हिंदी कवि और साहित्यकारों की पुस्तकें रोचक, कई बार पढ़ने के बाद भी पढ़ने का मन: र|ा कर्ष

बांकीमोंगरा निवासी र|ा कर्ष गर्वमेंट पीजी कालेज में बीए अंतिम वर्ष में पढ़ाई कर रही है। उसके अनुसार हिंदी भाषा का इतिहास प्राचीन है लेकिन उसे पहले जैसा महत्व नहीं मिल रहा है। हिंदी भाषा के विकास के लिए स्कूल स्तर से ही ठोस कदम उठाने की जरूरत है। र|ा ने कहा कि पुराने हिंदी साहित्य के जानकार व लेखक महादेवी वर्मा, मुंशी प्रेमचंद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएं पढ़कर अपनी हिंदी को बेहतर करने की कोशिश करती हैं।

हिंदी भाषा को लेकर युवाओं में झिझक, ध्यान देने जरूरत: संतोष

गर्वमेंट पीजी कालेज में बीए की बढ़ाई कर रहे छात्र (20)संतोष गिरी का कहना है कि आज के दौर में पढ़ाई के साथ बोलने में भी हिंदी भाषा को लेकर युवाओं में झिझक है। आज स्कूलों में बच्चों को हिंदी में पूरी गिनती ठीक से आए न आए लेकिन इंग्लिश में वन से हंड्रेड तक की गिनती सिखाने में अधिक ध्यान दिया जाता है।

हिंदी को बढ़ावा देने होने चाहिए प्रयास: भारती

कालेज की छात्रा भारती चौहान ने कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए प्रयास होने चाहिए। इंग्लिश में शिक्षा गलत नहीं है। लेकिन हिंदी भाषा की भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। अमूमन पहले बड़े शहर व उच्च शैक्षणिक संस्थानों में इंग्लिश में शिक्षा पर जोर दिया जाता था।

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