कोरबा के जिस कारसेवक ने अयोध्या में गोली व लाठियां खाईं थी, अब गुमनाम

Korba News - राममंदिर निर्माण के लिए वर्ष 1990 व 1992 में हुई कारसेवा में देश के कोने-कोने से रामभक्त शामिल हुए थे। उनमें से कुछ को तो...

Bhaskar News Network

Nov 10, 2019, 07:26 AM IST
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राममंदिर निर्माण के लिए वर्ष 1990 व 1992 में हुई कारसेवा में देश के कोने-कोने से रामभक्त शामिल हुए थे। उनमें से कुछ को तो बड़ी राजनीतिक सफलता मिली वहीं कुछ ऐसे भी थे जो गुमनामी में खो गए।

ऐसे ही एक कारसेवक का नाम है गेसराम चौहान। कोरबा जिले की करतला तहसील के ग्राम चचिया के मूलनिवासी हंै। वे छत्तीसगढ़ के ऐसे एक मात्र व्यक्ति हैं जिन्हें 1990 की कारसेवा में पेट में गोली लगी। उसके बाद 1992 की कारसेवा में भी शामिल हुए और लाठियां खाई। गेसराम के पिता स्व.भरतराम चौहान किसान थे। पिता की मौत के बाद अब तीनों भाइयों ने इनकी जमीन भी हड़प ली। गेसराम अब सिमकेंदा करतला के आसपास के गांव में भिक्षाटन कर गुजर बसर कर रहे हैं। जब उन्हें हमने बताया कि जिस राममंदिर के लिए तुमने गोली खाई थी वह अब बनने वाला है। तब 65 साल के हो चुके गेसराम अवाक हो गए। हाथ में पकड़ी लाठी, भिक्षापात्र व झोला गिर पड़ा। भावावेश में वे रोने लगे। बार-बार पूछते रहे कि अब तो रामलला का मंदिर सचमुच बनेगा न। आपको प्रणाम जो यह खुशखबरी दे रहे हो। 1990 में कोरबा से कारसेवकों का जत्था जुड़ावन सिंह ठाकुर, किशोर बुटोलिया की प्रमुख अगुवाई में गया था। जुड़ावन सिंह ठाकुर को ग्रामीण क्षेत्र का जिम्मा था। इन्होंने बताया कि उनकी टीम में ही चचिया का 35 साल का उत्साही युवक गेसराम भी शामिल था। 30 अक्टूबर को सभी फैजाबाद पहुंच चुके थे। उसी दिन कारसेवकों पर पहली गोलीबारी हुई। इसके बाद 2 नवंबर को जब कारसेवकों का बड़ा जत्था आगे बढ़ा तो फिर से पुलिस व सुरक्षाबलों ने फायरिंग कर दी। जिसमें गेसराम को गोली लगी। कारसेवक आनंद गजेन्द्र ने घायल हुए गेसराम के पेट से बाहर आ गई अंतड़ियों को अंदर करते हुए गमछा बांध दिया। फैजाबाद हास्पिटल में 15 दिन तक गेसराम भर्ती थे।

गेसराम भिक्षाटन से कर रहे गुजर बसर

राम मंदिर बनने की खबर सुन रो पड़े गेसराम, 1990 में कारसेवकों पर फायरिंग में पेट में गोली लगने से अंतड़ी बाहर निकल आई थी, साथी ने बचाई थी जान

पेट में गोली लगने से निकली अंतड़ी को साथी ने अंदर कर गमछे से बांधा और अस्पताल पहुंचाया था

राममंदिर की बात सुन रोने लगे गेसराम।

जिले से 70 किमी दूर गुरमा में मिले

किशोर बुटोलिया का दावा है कि गेसराम छत्तीसगढ़ के इकलौते कारसेवक थे जिन्हें गोली लगी। कुदमुरा निवासी चंद्रेश कश्यप व बुधराम चौहान की मदद से शनिवार को उन्हें कोरबा से 70 किलोमीटर दूर गुरमा में ढूंढ़ निकाला।

वर्ष 1992 में दोबारा गए थे अयोध्या, लाठियां खाईं थी

उन्होंने बताया कि 1990 में सिटी कोतवाली अयोध्या के पास उन्हें गोली लगी। वे घायल होकर गिर पड़े। फिर फैजाबाद हास्पिटल में ही ठीक से होश आया। वहां 15 दिन भर्ती रहे फिर बिलासपुर जिला अस्पताल और उसके बाद उनका इलाज एनटीपीसी जमनीपाली के हास्पिटल में हुआ। 1992 की कारसेवा में भी वे अयोध्या गए। 1992 में उन्हें तब के साडा अध्यक्ष बनवारीलाल अग्रवाल ने दैनिक वेतनभोगी के तौर पर साडा में काम दिया। 6 दिसंबर की कारसेवा में लाठियां खायी।

गेसराम की खेती की जमीन उनके भाइयों ने हड़प ली थी

बनवारीलाल के साडाध्यक्ष से हटने के बाद उन्हें इंजीनियर राठौर ने काम से हटा दिया। तीन भाइयों ने उनकी खेती किसानी की जमीन भी हड़प ली। ऐसे में कुछ समय रोजी मजदूरी व जड़ी बूटी से ग्रामीणों का इलाज किया उसके बाद बाबा के रूप में गांव गांव घूमने लगे। दो बेटे वीर सिंह व होरीलाल भैसखटाल बालको के पास रहते हैं। मजदूरी करते हैं। बेटी प्रीतम की शादी डूमरडीह निवासी रामकुमार से कर दी थी। पहली प|ी गुजरने के बाद ये बच्चे दूसरी प|ी मंगला बाई से हुए हैं। मंगला बाई कोटमेर में रहती हैं। गेसराम की जबान बातचीत के दौरान लड़खड़ा जाती थी।

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