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संसार दुखालय है, शांति तो सिर्फ भगवान के ही चरणों में समर्पण करने से है: शारदानंद सरस्वती

Korba News - हम शांति की खोज में यहां-वहां भटकते रहते हैं। किन्तु संसार में शांति नहीं मिलती, क्योंकि संसार तो दुखालय है, जहां...

Nov 22, 2019, 07:00 AM IST
हम शांति की खोज में यहां-वहां भटकते रहते हैं। किन्तु संसार में शांति नहीं मिलती, क्योंकि संसार तो दुखालय है, जहां सिर्फ दुख ही दुख है। शांति तो सिर्फ भगवान के चरणों में सर्वस्व समर्पण करने में है।

यह बात गुरुवार को शतमुखकोटि हरिहरात्मक महायज्ञ के मार्गदर्शक परमहंस स्वामी शारदानंद सरस्वती ने गुरुवार को रुद्राभिषेक व शिवार्चना के बाद भक्तों से कहा। उन्होंने आगे कहा कि इस संसार सागर से पार होने के लिए केवल भगवान के चरणों का ही सहारा है। उन्होंने बताया कि पाण्डवों ने अपने को श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था। इसीलिए कौरवों की भारी भरकम सेना को पराजित करने में सफल रहे। मां नर्मदा के बारे में उन्होंने कहा कि नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर है, किन्तु हम एक पत्थर घर में लाकर पूजन अर्चन करते हैं। इसी प्रकार सभी परमात्मा के अंश हैं किन्तु कोई एक गुरु ही शिष्य को इस संसार सागर से पार करा देते हैं। गुरु को मालूम होता है कि शिष्य का भला किसमें है। संत सम्मेलन के दौरान स्वामी शारदानंद ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को हर दिन कुछ समय के लिए ही सही भजन पूजन जरूर करना चाहिए।

अपनी भाव भगवान के समक्ष भावपूर्ण निवेदन के साथ कहनी चाहिए। लोकव्यवहार में भी हर बस्तु का भाव होता है। ऐसे में भगवान भी भाव के भूखे हैं। जितने अच्छे भाव से प्रार्थना करेंगे उतनी ही जल्दी हमारी प्रार्थना मंजूर होगी। यज्ञ की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि यज्ञ में प्रमाद नहीं होना चाहिए। संयम नियम का पालन करते हुए शुद्ध भाव से यज्ञ में भाग लेकर अपने जीवन को सफल बनाते हुए प्रभु चरणों का हर समय ध्यान करना चाहिए। संत सम्मेलन में अमरकंटक से आए महंत रामभूषणदास, जोधपुर के संत विनयदास महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी हरिहरानंद महाराज, स्वामी राघवाचार्य महाराज उपस्थित थे।

संत सम्मेलन में आसीन विद्वान संतगण।

भारत माता में उत्कर्ष में करें सहयोग, सह हम सभी का है कर्तव्य: आचार्य धर्मेन्द्र

विश्व हिंदू परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल के मेंबर आचार्य धर्मेन्द्र का भी सानिध्य शतमुखकोटि हरिहरात्मक महायज्ञ के दौरान संत सम्मेलन में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को गुरुवार को मिला। आचार्य धर्मेन्द्र ने सम्मेलन के दौरान कहा कि तर्क के तराजू पर ही विचार करके अपने विश्वास को मजबूत करें। अपने धर्म पर अडिग रहकर धारण करें, भगवान पर दृढ़ विश्वास रखकर भारतमाता के उत्कर्ष में सहयोग करना हम सभी का कर्तव्य है।

महायज्ञ के लिए बने यज्ञशाला की परिक्रमा करते श्रद्धालु

धर्म निर्दिष्ट कर्म ही श्रेष्ठ है : स्वामी विशोकानंद

निर्वाण पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज टेढ़ी नीम, वाराणसी ने संत सम्मेलन में कहा कि धर्म निर्दिष्ट कर्म ही श्रेष्ठ है। काशी में विराजित विश्व के नाथ विश्वनाथ हैं। उसी तरह से यज्ञ भी विश्व कल्याण की भावना से रचा गया है। ऐसी महायज्ञ में शामिल होने मात्र से ही मानव का कल्याण होता है।

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