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जिला अस्पताल में ब्लड कम्पोनेंट सेपरेटर नहीं, मशीन लग जाए तो एक यूनिट ब्लड से 3 मरीजों की बचेगी जान

Korba News - कोरबा। जिला अस्पताल में प्रति माह 400 से अधिक यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। दानदाताओं की मदद से वैसे तो यह जरूरत पूरी...

Jan 16, 2020, 07:20 AM IST
Korba News - chhattisgarh news there is no blood component separator in the district hospital if a machine is installed then 3 patients will be saved from one unit blood
कोरबा। जिला अस्पताल में प्रति माह 400 से अधिक यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है। दानदाताओं की मदद से वैसे तो यह जरूरत पूरी होती रहती है, लेकिन कई बार खून की कमी भी हो जाती है। ऐसे में यहां ब्लड कम्पोनेंट सेपरेटर मशीन नहीं होना एक बड़ी परेशानी है। यदि यह मशीन यहां लग जाए तो किसी दानदाता से मिले एक यूनिट ब्लड से अलग-अलग कर 3 मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

बता दें कि जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से सिकलिंग के मरीज व गर्भवती को खून दिया जाता है। इनके अलावा आपात स्थित व ऑपरेशन के मरीजों के लिए भी खून की जरूरत पड़ती है। फिलहाल सिविल सर्जन डॉ. अरुण तिवारी, ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. जीएस जात्रा, काउंसलर वीणा मिस्त्री के साथ स्टाफ यहां आने वाले जरूरतमंदों को रक्तदान के लिए प्रेरित करते हैं। फिर भी कभी-कभी ऐसी स्थिति बनती है कि विभिन्न संगठनों से इन्हें रक्तदान शिविर आयोजित करने की अपील करनी पड़ती है। ये शिविर से मिलने वाला खून ही बड़ी जरूरतें पूरी करता है। इसके बाद भी कई बार ब्लड को लेकर परेशानी की होती है। यह सुविधा होने से ऐसी स्थिति नहीं आएगी।

आवश्यकता
जिला अस्पताल में हर महीने 400 से अधिक यूनिट ब्लड की पड़ती है जरूरत, कई बार आती है दिक्कत

कोरबा का जिला अस्पताल।

ब्लड की कमी को दूर करने का डॉक्टरों ने बताया बेहतर तरीका, अब प्रबंधन को पहल करने की जरूरत

मशीन महंगी नहीं, प्रक्रिया भी सरल मशीन महंगी नहीं, प्रक्रिया भी सरल

एक अन्य डॉक्टर ने कहा कि जिला अस्पतालों में ब्लड सेपरेटर होना ही चाहिए। जब उनसे उनके दाम के संबंध में कहा कि सरकार के लिए इलाज की सुविधा व मरीज की जान के आगे लागत को नहीं आंका जाना चाहिए। वैसे भी यह मशीन इतनी महंगी नहीं है। यह एक तरह का मैकेनिकल इंस्टूमेंट ही है। जब ब्लड बैग को इसमें रखकर तेजी से घुमाया जाता है तो वजन के मुताबिक ही सबसे नीचे आरबीसी, उसके बाद डब्ल्यूबीसी प्लेटलेट्स और सबसे ऊपर प्रोटीन प्लाज्मा हो जाता है। जिसे अलग-अलग लेकर सुरक्षित रखा जाता है।

तीन अलग-अलग बीमारियों में एक ही यूनिट ब्ल्ड का डॉक्टर कर सकेंगे उपयोग

मरीज में यदि हिमोग्लोबिन की कमी हो जाए तो उसे आयरन की जरूरत तो होती ही है, तात्कालिक तौर पर उसे आरबीसी की भी जरूरत होती है। डब्ल्यूबीसी डेंगू, मलेरिया, में तेजी से घटती है। वहीं प्लेटलेट्स पर भी असर होता है। कैंसर में भी इसकी कमी होने लगती है। डब्ल्यूबीसी की कमी होने पर चोट लगने पर खून तेजी से बहने लगता है। संक्रमण फैलता है। सो ऐसी स्थिति में खून में डब्ल्यू बीसी चढ़ाया जाता है। वहीं प्लाज्मा पानी व प्रोटीन का हिस्सा है। बर्न फेसेस में प्लाज्मा की ही ज्यादा जरूरत होती है। एक सरकारी डॉक्टर ने बताया कि रक्तदान के प्रति लोगों में जागरूकता तो आई है, लेकिन अभी दिक्कत होती है।

अब नहीं चढ़ाया जाता पूरा खून ताकि लाभ मिले 3 मरीजों को : डॉ. शेष

पैथोलॉजिस्ट डॉ. अजय शेष ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अब जो पढ़ाई कराई जाती है, जो प्रशिक्षण दिया जाता है। उसमें हॉल ब्लड कम्पोनेंट अर्थात पूरा का पूरा यूनिट खून नहीं चढ़ाया जाता है। खून में दरअसल तीन अलग-अलग भाग होते हैं। लाल रक्त कणिकाएं (आरबीसी), प्लेटलेट्स श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी) व प्लाज्मा प्रोटीन। दरअसल अलग-अलग मरीजों में उक्त तीनों की उनकी बीमारी के अनुसार अलग-अलग जरूरत होती है। वहीं मरीज में जरूरी नहीं कि तीनों ही चीजें कम हों। जब अलग-अलग हिस्से की जरूरत के अनुसार ब्लड कम्पोनेंट मरीज को चढ़ाया जाता है। तो उसके इलाज में भी बेहतर परिणाम आते हैं। वहीं एक यूनिट ब्लड से ही 3 मरीजों की जरूरत भी पूरी हो जाती है। आधुनिक युग में खून की कमी से किसी की मृत्यु होना अभिशाप ही है। इसी वजह से अब बड़े व निजी ब्लड बैंक में खून को अलग-अलग हिस्सों में करके मरीज को चढ़ाया जाता है। कम से कम राज्य के सभी जिला चिकित्सालयों में इसका होना जरूरी है ताकि खून की कमी न हो व दान में मिले खून का पूरा उपयोग हो।

जिला समेत अन्य सरकारी अस्पतालों में 10 डॉक्टरों की हुई है नियुक्ति

जिला अस्पताल व अन्य शासकीय अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) से 10 डॉक्टरों की नियुक्ति की गई है। जिला अस्पताल के साथ बने नए भवन में बर्न यूनिट, आईसीयू, ट्रामा केयर आदि विभाग की स्थापना की तैयारी शुरू कर दी गई है। यहां एमआरआई, सिटी स्कैन जैसी आधुनिक सुविधाओं की भी कमी है। इस सबके बीच सर्वाधिक जरूरी ब्लड कम्पोनेंट सेपरेटर की महसूस की जा रही है। यदि यह मशीन यहां लग जाती है तो खून की कमी में राहत मिलेगी।

अस्पताल में बुक मेंटेन करना तक होता है कठिन, स्टाफ की भी कमी

एक निजी ब्लड बैंक के संचालक ने बताया कि दरअसल खून को अलग-अलग करना तो सरल है। मशीन भी महंगी नहीं है, लेकिन शासन के नियमों के अनुसार अलग-अलग कम्पोनेंट में जब खून को बांटा जाता है तो एक तरह का ड्रग माना जाता है। फूड एंड ड्रग सेफ्टी नियम के तहत हर ब्लड बैंक को करीब 5 दर्जन दस्तावेजों में सारा रिकार्ड रखना पड़ता है। गवर्नमेंट हॉस्पिटल में तो स्टाफ की ही कमी बनी हुई है। सरकार नियुक्तियां कर नहीं रही है। वहीं अलग-अलग तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन का जिम्मा भी मौजूदा स्टाफ पर ही डाला जा रहा है।

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