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पर्यावरण को बचाने सीड बॉल तकनीक 20 साल पहले आदिवासी परिवार ने इजाद की, अब वन विभाग ने अपनाया

6 महीने पहले
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सीड बॉल तकनीकि के जरिए आदिवासी नाथाराम खैरवार के लगाए गए पौधे अब पेड़ बन चुके हैं।
  • एक हजार से अधिक पौधे लगाए, अब बेटा राधेश्याम भी कर रहा पौधरोपण, पहाड़ों पर भी लगाए पौधे
  • सीड बॉल तकनीक में बीज को मिट्‌टी में लपेट कर बॉल बनाकर बारिश के दिनों में खेत व जंगलों में फेंकते हैं
  • अमेरिका में रहने वाले अप्रवासी छत्तीसगढ़ियों की संस्था नाचा ने सम्मानित किया था नथराम खैरवार को
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जांजगीर. छत्तीसगढ़ के जांजगीर में आदिवासी खैरवार परिवार ने जिस सीड बॉल तकनीकी का इजाद 90 के दशक में किया था, उसे अब वन विभाग अपना रहा है। इसको लेकर अमेरिका में रहने वाले अप्रवासी छत्तीसगढ़ियों की संस्था नाचा ने 7 दिसंबर 2019 को राधेश्याम खैरवार को सम्मानित किया था। राधेश्याम के पिता नथराम ने इसका उपयोग 20 साल पहले करते थे। सीड बॉल वह तकनीक है जिसमें बीज को मिट्‌टी में लपेट कर बॉल बनाते हैं। बारिश के दिनों में इसे जंगल या खेतों में फेंकने पर पौधे उग जाते हैं। उनकी मेहनत के चलते ही वे पौधे एक हजार से ज्यादा पेड़ बन चुके हैं। 

1) वन विभाग से अनुमति लेकर लगाए पौधे, पंचायत ने गिनती कर पुष्टि की

बलौदा ब्लॉक की ग्राम पंचायत हरदी का आश्रित गांव सराईपाली। यहां की जनसंख्या बमुश्किल 700 है, यह आदिवासी बहुल गांव है। ग्रामीणों के अनुसार यहां आदिवासियों की संख्या लगभग 500 होगी। इनका मूल व्यवसाय खेती करना है, जिनके पास जमीन नहीं वे दूसरों की जमीन अधिया, रेगहा लेकर काम चलाते हैं। इस गांव में नथराम खैरवार थे। इनके नाम पर जमीन नहीं थी, अभी भी इनके बेटे राधेश्याम खैरवार के पास खेती के लिए जमीन नहीं है। सराईपाली के पास एक छोटी सी पहाड़ी है। 

इसी पहाड़ी के किनारे नथराम ने घर बनाया था। इसी जगह पर सरकारी खाली जमीन थी। इस जमीन पर इन्होंने पौधे लगाना शुरू कर दिया। खैरवार परिवार पौधे लगाने के लिए गड्‌ढे खोदते थे, उन गड्ढों में एक से अधिक पौधों के बीजों को डाल देते थे। वर्तमान में इस क्षेत्र में उनके लगाए गए एक हजार से अधिक पौधे विकसित होकर पेड़ बन गए हैं। उनका साथ उनकी पत्नी लक्ष्मीन बाई खैरवार ने भी दिया। नथराम की मौत 2013 में हो गई। अब उनका बेटा राधेश्याम पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।  

गांव के विजय साहू ने बताया कि नथराम अपने जीवन काल में पेड़ पौधों की पत्तियां भी तोड़ने नहीं देते थे। सराईपाली में जो पहाड़ी है उसमें भी उन्होंने पौधे लगाए तथा हनुमान मंदिर के पास चौड़ीकरण भी उन्होंने ही किया। एक बार नथराम का भतीजा कीर्तन पौधे से फल तोड़कर खाने लगा तो नथराम ने उसे पकड़ कर पेड़ में बांध दिया और खुद गड्‌ढा खोदकर फलों के बीज को उसी गड्‌ढे में डलवाया। 

नथराम खैरवार ने सरकारी जमीन में पौधा लगाने के लिए बाकायदा वन विभाग से अनुमति ली। वन विभाग से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने पौधे लगाए। उनके द्वारा लगाए गए पौधों को ग्राम पंचायत के लोगों ने प्रमाणित भी किया है। इसके लिए पंचायत ने उनके द्वारा लगाए गए एक- एक पौधों को गिना है कि कितने बरगद, कितने पीपल या अन्य पौधे लगाए गए हैं। इसके बाद 1996 के ग्राम सुराज अभियान में पंचायत ने प्रमाणित भी किया है कि नथराम ने तब तक एक हजार 28 अधिक पौधे लगाए थे। 

पर्यावरण के प्रति उनके इस कार्य के लिए न्यूयॉर्क अमेरिका में रह रहे छग के अप्रवासियों की संस्था नार्थ अमेरिकन छग एसोसिएशन (नाचा) नामक संस्था ने इन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया है। वहां रह रही हरदी की विभा साहू ने अपने फेसबुक अकाउंट में भी इसे शेयर किया है। सूचना मिलने पर वहां गए समाजसेवी राघवेंद्र पांडेय को भी टैग किया है। 

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