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40 साल पहले कहा ‘‘जस्सी जैसी कोई नहीं’’ और दुबई से यहां आ गया ये वैलेंटाइन, जानता था जीवनभर व्हीलचेयर पर रहेगी पत्नी

Raigarh News - मुझे वैलेंटाइन डे पर अपने पुराने दिन याद आते हैं। 40 साल पहले की 14 फरवरी मुझे अच्छी तरह याद है, जब मैंने जस्सी को पहली...

Bhaskar News Network

Feb 14, 2019, 03:07 AM IST
Raigarh News - chhattisgarh news 40 years ago said quotno one like jassiquot and came here from dubai the valentine knew life would remain on wheelchair for life
मुझे वैलेंटाइन डे पर अपने पुराने दिन याद आते हैं। 40 साल पहले की 14 फरवरी मुझे अच्छी तरह याद है, जब मैंने जस्सी को पहली बार देखा। मासूम और हंसमुख चेहरे के साथ स्कूल के गेट पर वह अपनी ट्रायसिकल से आई और मेरा दिल ले गई। उसे देखा तो फिर एक पल के लिए जेहन से नहीं उतरी उसकी शक्ल।

मैं मूलत: केरल का रहने वाला हूं, मेरे पिता खरसिया म्यूनिसिपल में ठेकेदार थे, हमारा परिवार वहीं रहता था। मैं पॉलीटेक्निक कॉलेज में पढ़ने आया था। वैलेंटाइन डे के दिन कॉलेज से निकलकर मैंने हिम्मत जुटाई और जस्सी को प्रपोज किया। जस्सी ने मेरा प्रस्ताव ठुकराया, मुझे तकलीफ हुई। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद मैं दिल्ली चला गया लेकिन मैं जस्सी को भूल नहीं पाया। यूएई सरकार ने दूसरे देशों के नागरिकों को वहां नौकरी दी। मुझे भी वहां नौकरी मिली। मैंने दुबई में रहते हुए जस्सी के घरवालों से बात की और बताया कि मैं जस्सी से शादी करना चाहता हूं। उनके परिवार के लोग तो तैयार थे लेकिन जस्सी दोनों पैरों से दिव्यांग थी इसलिए उसने शादी करने से इनकार कर दिया। मेरी मानसिक हालत बिगड़ गई, मुझे तीन महीनों तक वहां साइकैट्रिस्ट (पागलपन या मानसिक रोगों का इलाज करने वाले डॉक्टर) से इलाज करना पड़ा। इसकी जानकारी कुछ कॉमन दोस्तों के जरिये जस्सी तक पहुंची। इसके बाद जस्सी शादी को राजी हुईं। वर्ष 1996 में हम दोनों ने चर्च में शादी कर ली। शादी के बाद मैं वापस दुबई लौटा, तब मेरे साथ जस्सी नहीं थी। वो समाज सेवा करना चाहती थी इसलिए उसने जाने से मना कर दिया। उसके बिना दुबई में मेरा मन नहीं लगा और मैने नौकरी छोड़ दी। अब हम दोनों एक साथ रहते हैं। जस्सी के काम में मैं भी हाथ बंटाता हूं। (थॉमस फिलिप ने पहली बार भास्कर से अपनी प्रेम कहानी शेयर की)

शादी के कुछ दिनों बाद की फोटो

जस्सी और थामस फिलिप।

पकड़ ली समाज सेवा की राह

जस्सी पहले से समाज सेवा का रास्ता अपना चुकी थी। दुबई से लौटने के बाद थॉमस ने भी इसी राह को चुना। जस्सी खुद दिव्यांग थी इसलिए वह दिव्यांग के लिए ही काम करना चाहती थी। थॉमस ने जस्सी के इस काम में सहयोग किया। थॉमस पिछले 23 साल से हर रोज सुबह दिव्यांग को ढूंढ कर खाना खिलाते हैं। भटके हुए लोगों को उनके पते पर भेजने का काम भी वे ही करते हैं। गरीब महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, बुनाई इत्यादि प्रशिक्षण देते हैं।

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