अघन गुरबारी हर सुख समरिद्धी अव भगती के तिहार हावय

Raigad News - अगहन महीना म लछमी हर घरो-घर बिराजथे, देबता अव राक्छस मन मिलके समंुदर ल मथिन त रकम-रकम के वसतु निकलीस, वोही बेरा म...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 07:11 AM IST
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अगहन महीना म लछमी हर घरो-घर बिराजथे, देबता अव राक्छस मन मिलके समंुदर ल मथिन त रकम-रकम के वसतु निकलीस, वोही बेरा म लक्ष्मी दाई हर एक हाथ म कमल के फूल, अव सोन के कलस धरे सोन, हीरा, चांदी के गहना-गुंथा ल पहिरे समुंदर ले निकलिस त जम्मो देबता असुर मन अकबका गीन ओतके बेर बिसनु भगवान हर लक्ष्मी दाई ल देख के मोहागे अव मनेमन म अपन प|ी मान लेहिस, दाई हर घलोक भगवान बिसनु ल अपन पति मान लीहीस, सुख समरीघ्दी भगवान आय, ओकरे बर जब फसल हर कटते त अन्न रूपी लक्ष्मी दाई घर म आथे, अव गुरबारी पूजा ल करिथे, सब्बो परांत म फसल के कटाये अव घर म आये ले तिहार मनाथे, ओणम, लोढ़ी, पोंगल, छेरछेरा, गुरबारी, जम्मो परांत म आने-आने नाव ले मनाये जाथे, लेकिन तिहार के उद्द्ेस हर एके रहिथे, माता लक्ष्मी हर धन-धान्य के देबी आय, गुरबारी हर सुख समरीधदी अव भगती के तिहार हावय, अगहन गुरबारी आये के पहिरी दिन बुधबार के घर ल खुटियाथे, चुना नहीं तो छुही म जम्मो मैलहा ओनहा-कपरा ल कांचथे, घर ल पहरी जम्मो अंगत ल बहार के गोबर म लीपके सुध्द करिथे, चाउर ल फूलो के पीस के रेहन बनाथे, अव दुवारी म लक्ष्मी पांव अव चौक पुरथे उ पूजा करिथे तिंहा तक लानथे, तुलसी मेर घलो लक्ष्मी पांव बनाथे, रंधनी खोली म घलो चौक पारथे, अलमारी हावय तिहों लक्ष्मी पांव बनाके पूजा करिथे, पीढ़वा ल धो-पोंछ के, लक्ष्मी ल अंवरा अव हरदी म नहंवा के नवा कपरा या धोआय कपरा पहिरा के पीढ़वा म कांसा के थारी म नवा चाउर नई ऐ त जून्ना चाउर घलो ल भरके लक्ष्मी दाई के फोटो, मुरती, नंवालुगरा चढ़ा के गौर गनपति हाथी लक्ष्मी दाई के श्रीयंत्र ल मढ़ाथे ओकर तीर मं, कलस म सुपारी एक रूपिया के सिक्का डार के पानी भर के उपर आमापान सात या पांचठन अंवरापान, बोईर पान राख के, कांसा के कटोरी म नवा धान भर के ओकर उपर बड़का माटी के दिया मं घी या तेल के दीया बारथे, दूसर दिन बिहनियां अंघहरहा म उठ के पीसे अंवरा अव हरदी मिला के नहाथे वो दिन साबुन म नई स्नानना चाही, तंहा दुवारी म कपाट के दूनों अंगत दीया बारना चाही, तुलसी चौरा घलोक अब दीया जला के बाहिर चौक के पूजा करिके चाउरफूल छींचके छेना ल जलाके धूप जलाना चाही सक्कर या बिही के भोग लगाके पांव परना चाही तहां जम्मों अंग के चौक के पूजा करत दाई के आसन अंगत आना चाही, पंचामृत म अस्नान तहां सुध्द जल ले अस्नान कराके, नाल चढ़ाके, चंदन, रोली, गुलाल, हरदी, सेंदुर, पींवरा अछत, दुबी, फूल गोंदा के फूल, केरा, नरियर, सेब सिंहारा, छीताफर, बिही, चढ़ाके, कांसा के एक ठन कटोरी म केरा नही तो बीही ल काट के भोग लगाथेे, बीरापान, सुपारी, लवांग, हरदी इलायची ल, चढ़ाके घंटी बजागे या संख बजाथे, तंह महा लक्ष्मी के पुरान के कथा ल पढ़थे, कथा के सुरबात दोहा ले होथे, तहां चौपाई हावय, हाथ म चाउर-फूल धर के कहानी सुनथे या पढ़िथे, एक बार लक्ष्मी दाई हर भगवान बिस्नु ल कहिथे मय हर भूलोक जावथौं अघ्घन के पूजा देखे बर भगवान कहिथे जा, दाई हर आथे त देखथे कोनो घर म चौक नई पूराये हावय,जम्मो सूतत हावय, गांव बाहिर म घसनीन हर छरा देत रहिथे त दाई ओला कहिथे तैंहर गुरबारी ल मान धन-धान के पराप्ती होथे, त वोहर पूजा के बिधी ल पूछ के तिहार ल मानथे, दाई ओला सुख समरीद्धी के आसीस देथे, गुरबार के बहरी नई बहारै, मुर्रा नई खावय तावा के रोटी नई खावय, तेल नई लगावैं, पीरा रंग के ओन्हा पहिनथे, पईसा खरचा नई करय, मांस-मछरी नई खावय, रात के भात नई खावय, केबल परसाद ल ही खाथे, लहसुन पियाज नई खावय, रात कन जूठा नई छोड़य, सील, सूपा म कछु बूता नई करय।

किरण शर्मा खरसिया

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