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पर्यावरण विभाग ने कहा- ध्वनि प्रदूषण रोकना पुलिस की जिम्मेदारी, पुलिस कह रही- हमें मशीनें नहीं मिलीं
शहर में ध्वनि प्रदूषण भी परेशानी का कारण बन रहा है। शहर के साइलेंस जोन और रिहायशी इलाकों में शाम के 6 बजे कमर्शियल और इंड्रस्ट्रियल एरिया जैसा 70.3 डेसीबल तक शोर है। जबकि आवासीय क्षेत्रों में इसकी सीमा 45 से 55 डेसीबल है। शोर से सुनने में तकलीफ, हृदयघात, चिड़चिड़ापन जैसी अन्य बीमारियां हो रही हैं। शहर में बढ़े ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए पर्यावरण संरक्षण मंडल विभाग संजीदा नहीं हैं। अधिकारी ध्वनि प्रदूषण की जांच करने के लिए रायगढ़ और जांजगीर-चांपा पुलिस को 24-24 ध्वनि मापन यंत्र देने की बात कह रहे हैं। जबकि रायगढ़ व जांजगीर पुलिस के अफसर यंत्र नही मिलने की बात कह रहे हैं। ट्रैफिक विभाग के अनुसार यह जिम्मेदारी पर्यावरण संरक्षण मंडल की है। ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण पर्यावरण विभाग पुलिस को, तो पुलिस पर्यावरण विभाग का काम बता रही हैं। रायगढ़ मंडल कार्यालय में तैनात क्षेत्रीय अधिकारी अजय गेड़ाम ने बताया कि एक साल पहले ध्वनि प्रदूषण की जांच करता था, पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मंडल के रायगढ़ और जांजगीर-चांपा पुलिस को 24 मशीनें दी गई थीं।
ध्वनि प्रदूषण का मानक और स्थित
क्षेत्र मानक स्थित
{औद्योगिक क्षेत्र 75 95
{व्यापारिक क्षेत्र 65 85
{आवासीय जोन 55 70
{साइलेंट जोन 50 72
डा. दिनेश पटेल, ईएनटी स्पेशलिस्ट मेकाहारा
ध्वनि प्रदूषण के यह हैं मानक
ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता, चिड़चिड़ापन, हदयघात, कोलेस्ट्राल बढ़ने और अवसाद जैसी समस्याएं होती हैं। शहर में तेजी से बढ़ रहे वाहन ध्वनि प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक 60 से 70 डेसीबल का शोर करना अपराध की श्रेणी में आता हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वाले दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 290 और 291 के अलावा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत एक लाख रुपये का जुर्माना अथवा पांच साल तक की जेल या फिर दोनों सजा एक साथ हो सकती है।