सुख में भगवान को भूलना जीवन के आनंद से दूर करता है : भागीरथी

Raigarh News - शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के दिन रविवार को नवागड़ी राजापारा में मंदिर में भक्तों द्वारा सुबह विधि पूजा की गई। सुबह में...

Nov 11, 2019, 07:26 AM IST
शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के दिन रविवार को नवागड़ी राजापारा में मंदिर में भक्तों द्वारा सुबह विधि पूजा की गई। सुबह में आयोजन समिति के सदस्यों ने तुलसी पूजा की। श्रीमद्भागवत कथा शुरू होने से पहले संगीत के साथ ढोलक, हरमोनियम की धुन पर भगवान का कीर्तन किया गया। इसके बाद कथावाचक भागीरथी महाराज ने सुदामा चरित्र, प्रद्युम्न चरित्र, भगवान का विवाह कथा का वाचन किया। अंत में श्रोताओं को आचरण में उतारने के लिए ज्ञान योग बातों में सुख, पाप, की बात बताई। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या मंे भक्त पहुंच रहे हैं।

सुख की तुलना एक दूसरे से न करें, पाप-पुण्य हमने बनाया

कथा वाचक भागीरथी।

भागवत में कहा गया है- प्रेम से ही भगवान को जाना और पाया जा सकता है

भागवत में कहा गया है कि भगवान ने सोलह हजार एक सौ आठ राजकुमारियों से विवाह किया। जिससे सो हजार एक सौ आठ वेदों की रचना की। वेद अर्थात ज्ञान, ईश्वर को ज्ञान के द्वारा जाना जा सकता है। लेकिन पाया नहीं जा सकता है। प्रेम से भगवान को जानने के साथ पाया भी जाता है।

सुख- संसार में मनुष्य अपने कर्मों को करते हुए, एक दूसरे से अपने सुख की तुलना हमेशा करता रहता है। यही वह पल होता जब वह अपने जीवन में मिले अनमोल सुखों को खोकर दुख के भंवर में फंस जाता है। मनुष्य के जीवन में सारे सांसारिक सुखों को देने के बाद भी दुख में फंसा रहेगा। वही सुख वास्तविक आनंद बनता जब हम ईश्वर की प्रेम में खो जाते है।

पाप- मनुष्य खुद की बुद्धि-विवेक से संसार में पाप-पुण्य का निर्माण कर लिया है। भगवान ने यह कहा कि अनंत पापियों से भी अधिक पाप करने वाला मुझे भजकर ज्ञान रूपी नौका से भवसागर को पार कर जाता है। उन्होंने बताया कि जीवन में इंसान को पाप-पुण्य के विचार से उठकर ईश्वर को भजना चाहिए।

सुदामा चरित्र

भगवान कृष्ण रूप में आकर सुदामा से मित्रता करते है। इस मित्रता के माध्यम से संसार को दिखाते है कि यह दुनियां का कितना पवित्र और प्रेम का रिश्ता है। सच्चा मित्र वही होता है जो सुख में भी साथ दे और दुख में भी साथ दे। सुदामा जी ने भगवान से सच्ची मित्रता निभाई। भगवान से उन्हें आखिरी समय में एश्वर्य मिला। सु अर्थात सुंदर, दाम अर्थात कीमत। जो भगवान को सुंदर मन पेश करता है। उसे भगवान अपना लेते हैं। इतिहास की घटनाओं में देखा गया है, जो परमात्मा का प्रिय हुआ उसका जन्म जन्मातर में गुणगान होने लगा।

प्रदयुम्न चरित्र

द्वापर युग में भस्मासुर का आंतक इतना बढ़ गया कि देवता भी उससे बचने के लिए तीनों लोक के शरण में जाने लगे। भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न द्वारा राक्षस भस्मासुर का उद्धार किया गया। भगवान से वरदान प्राप्त राक्षस ने खुद अपने उद्धार के लिए अपने ही काल को पाला और वही उसके अंत का कारण बना। महाराज ने बताया कि जीवन में हम अपने काल को खुद ही पालते है। आज लोग आलसी होते जा रहे हैं और जीवनरूपी ज्ञान को न समझकर काल के जाल में फंसते जा रहे हैं। इसके लिए वह खुद रास्ता बनाते हैं। जिसमें खान-पान, निद्रा का संयमित होना है।

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