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अहिंसा के लिए संकल्प और समर्पण पर चला भगवान महावीर का संपूर्ण जीवन

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 07:20 AM IST

Raigarh News - महावीर सत्य की खोज में अपने सभी मोह छोड़कर पूरी तटस्थता और निर्लिप्तता से जुट गए थे। 30 साल की उम्र में बिहार के...

Raigarh News - chhattisgarh news lord mahavir39s entire life has gone on resolution and dedication for non violence
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महावीर सत्य की खोज में अपने सभी मोह छोड़कर पूरी तटस्थता और निर्लिप्तता से जुट गए थे। 30 साल की उम्र में बिहार के कुंडलपुर में नाथ राजवंश में जन्मे महावीर ने वस्त्र तक का मोह नहीं रखा। 12 साल की तपस्या में सिर्फ 349 बार ही भोजन किया।

महावीर ने कहा था | भगवान का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्व प्राप्त कर सकता है। हर व्यक्ति का नजरिया और अनुभूति अपनी जगह सही हो सकती है, किंतु यदि वह अपने अधूरे ज्ञान को ही सही मान लेगा तो संपूर्णता के अभाव में उसका नजरिया और निर्णय एकतरफा हो जाएगा। इसलिए महावीर का निर्देश था कि एकांतवादी मत बनिए।

कहानी- वसुमती चम्पा नगरी की राजकुमारी थीं। युद्ध में पिता की मौत के बाद वसुमती को बंधक बना लिया गया था। एक सेठ ने उन्हें खरीद लिया। सेठ की प|ी वसुमती के साथ दुर्व्यवहार करने लगी। इधर कठोर तपस्या में लगे महावीर ने संकल्प लिया कि वे तभी भोजन करेंगे जब अन्न किसी ऐसी राजकुमारी द्वारा दिया जाए, जिसके बाल मुंडे हुए हों, जो बंधनों में जकड़ी हुई हो, जिसकी आंखों में आंसू हों और वह खाने के लिए भुने हुए चने दे। आखिर दासी बनी वसुमती ने उन्हें खाने के लिए चने दिए और महावीर का संकल्प पूरा हुआ। इस संकल्प को पूरा होने में पांच महीने पच्चीस दिन का समय लगा।

रायगढ़, बुधवार 17 अप्रैल, 2019

समर्पण: 12 साल, 5 महीने, 15 दिन का तप किया

महावीर ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए 12 साल, 5 महीने, 15 दिन का तप किया। 32 वर्ष तक धर्म का प्रसार किया। 72 की उम्र में मोक्ष प्राप्ति तक महावीर के अनुयायियाें में 14,000 मुनि, 36,000 आर्यिकाएं, 1,59,000 श्रावक और 3,18,000 श्राविका थे।

महावीर ने कहा था | जो भी प्राप्त करना है, अपने समर्पण और पराक्रम से प्राप्त करो। किसी से मांग कर, हाथ जोड़कर प्रसाद के रूप में धर्म प्राप्त नहीं किया जा सकता। धर्म मांगने से नहीं, स्वयं धारण करने से मिलता है। जीतने से मिलता है। स्वयं को जीतने के लिए संघर्ष आवश्यक है। आत्मकल्याण के लिए सबसे पहले अपनी हीनता, असहायता और दुर्बलता को छोड़ना चाहिए। महावीर का मार्ग ज्ञान और कर्म का मार्ग है। स्रोत : जैन पूजा डॉट कॉम और जैनी डॉट कॉम

कहानी- जंगल में तपस्या कर रहे महावीर को चंडकौशिक नाम के एक भयंकर सांप ने कई बार डंसा। पर महावीर पर कोई असर नहीं हो रहा था। सांप ने महावीर के अंगूठे में भी अपने दांत गड़ा दिए। इस पर भी उन्होंने सांप को न भगाने की कोशिश की और न ही खुद वहां से हटे। बाद में जब महावीर ने आंखें खाेली तब भी उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था। चंडकौशिक ने इससे पहले कभी इतना निर्भय और शांत प्राणी नहीं देखा था। इससे उसका भी स्वभाव बदल गया। वह तपस्या में जुट गया। लोगों ने उस पर पत्थर-लाठियां बरसाईं पर वह शांत बना रहा। समर्पण से उसके पाप कर्म भी नष्ट हो गए।

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