जीवन में गृहस्थ के बाद संन्यास का आना जरूरी :गोस्वामी

Raigad News - भगवान कृष्ण का जन्म कंस के कारागार में माता देवकी और वासुदेव को मुक्त कराकर धरती पर बढ़े अत्याचार को कम करने के लिए...

Jan 16, 2020, 07:31 AM IST
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भगवान कृष्ण का जन्म कंस के कारागार में माता देवकी और वासुदेव को मुक्त कराकर धरती पर बढ़े अत्याचार को कम करने के लिए हुआ।

नंद के आनंद भयो...जै कन्हैया लाल करने हुए श्याम मंदिर में मथुरा से आए महाराज कृष्ण गोस्वामी ने भक्तों के साथ भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में भक्तों को जीवन के चार जरुरी वर्ण का ज्ञान दिया। वही कथा में मोहनी स्वरुप, वामन अवतार, भगवान राघवेंद्र की कथा सुनाई गई। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

भागवत में सुंदर झांकी ने लोगों का मन मोहा ।

महाराज ने की जीवन के चार महत्वपूर्ण पल: वर्ण व्यवस्था की व्याख्या की

ब्रह्मचारी- ब्रह्मचारी जीवन यापन संस्कार को सीखने का समय होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु को प्रणाम कर उनसे विद्या का अध्ययन करे। जो कुछ संसार से लेकर आए गुरु के चरणों में अपर्ण कर दें। चंचलता का परित्याग करे।

गृहस्थी- गृहस्थ आश्रम में मनुष्य के लिए 30 साधारण धर्म आते है। जिस मार्ग पर चलकर मनुष्य योनी को सुधारना चाहिए। एकादशी व्रत ज़रुर करना चाहिए। पितर को दान-पून्य कर भगवान से याचना करनी चाहिए।

मोहिनी स्वरुप

भगवान ने देवताओं की सहायता के लिए मोहनी स्वरुप में अमृतपान करा कर उन्हें असुरों पर विजय दिलाई। मनुष्य के लिए यह संदेश दिया हमेशा सत्यव्रत रहकर प्रभु की भक्ति में लीन होकर सही रास्ते पर चलों। जीवन में ईश्वर उसी की परीक्षा लेता है जो सत्य के मार्ग पर चलता।

वामन अवतार

राजा बली के अहंकार का मर्दन करने के लिए भगवान विष्णु को वामन (बालक) रुप में प्रकट होना पड़ा। इसमें उन्होंने संसार को दिखाया कि आप कितने भी धनी, बलबान बन जाओं अहंकार करने पर सारा कुछ नष्ट हो सकता है। बली से मात्र तीन पग मांगकर ही उन्होंने उसका सब ले लिया।

भगवान राघवेंद्र

यह कथा है पवित्रता की। भगवान राम का मन जैसे पवित्र रहा। जीवन भर मर्यादा पुरुषोत्तम रुप में अपनी लीला की। उनका जन्म संसार के सभी दुष्टों का मर्दन कर भूमि का भार कम करने के लिए हुआ। एकोषी अर्थात सत्य के मार्ग पर चलने के लिए हुआ। सभी को ज्ञान देने के लिए हुआ।

वानप्रस्त- मनुष्य को अपनी इंद्रियों को संयम में रखकर वानप्रस्थ आश्रम का पालन करना चाहिए। जितना शरीर में सामर्थ्य हो उतना ही वन में जाकर निवास करना सही है। अंतर आत्मा से आवाज आने लगे तो वानप्रस्थ आश्रम में जीवन यापन करना होगा।

सन्यासी- सन्यासी लोगों को अपने भ्रमण काल में किसी ग्राम में एक रात से अधिक देर तक रुकना सही नहीं है। वहां जो कुछ मिल जाए ईश्वर का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेना चाहिए। ज्यादा विद्या के प्रपंच में पड़कर ज्ञान के अभिमान से दूर रहना उचित है।

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