छत्तीसगढ़ / कचरे को 138 तरीके से अलग कर कमा रहा अंबिकापुर, रायपुर में अभी भी गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में



अंबिकापुर : कचरे को अलग करती सफाई कर्मी। अंबिकापुर : कचरे को अलग करती सफाई कर्मी।
रायपुर : गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में। रायपुर : गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में।
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अंबिकापुर : कचरे को अलग करती सफाई कर्मी।अंबिकापुर : कचरे को अलग करती सफाई कर्मी।
रायपुर : गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में।रायपुर : गीला और सूखा कचरा एक ही डिब्बे में।

  • स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 के लिए शुरू हुई शहरों में जद्दोजहद
  • अंबिकापुर : दो लाख की आबादी वाला शहर सफाई के मामले में देश में दूसरा
  • रायपुर : तमाम अमला होने के बावजूद हर दिन शहर में कचरा ही नहीं उठा पा रहे

Dainik Bhaskar

Jun 15, 2019, 06:41 AM IST

रायपुर. राज्य में दो लाख की आबादी वाला अंबिकापुर शहर देश में स्वच्छता के लिए रोड मॉडल है, जबकि राजधानी रायपुर में आज भी डोर टू डोर कचरा कलेक्शन के लिए ही जद्दोजहद चल रही है। अंबिकापुर की महिलाएं 138 तरीके से कचरे को अलग कर कमाई कर रही हैं, लेकिन रायपुर में आज भी एक ही गाड़ी में गीले और सूखे कचरे का परिवहन किया जा रहा है। 


देशभर में स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 के लिए शहरों में प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। राज्य के दो शहर भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं, लेकिन पिछले स्वच्छता सर्वे में जहां देशभर में दूसरा स्थान हासिल करने वाला अंबिकापुर शहर इनोवेशन के जरिए छोटे-बड़े शहरों के लिए मॉडल बन चुका है, वहीं राजधानी में कई तरह की कोशिशों के बावजूद सफाई व्यवस्था में सुधार नहीं दिख रहा। आलम यह है कि रायपुर में आज भी जगह-जगह कचरे के ढेर हैं। नालियों की नियमित रूप से सफाई नहीं हो रही।

 

सफाई करने के बाद गंदगी किनारे पर छोड़ दी जाती है, जिसे उठाने के लिए कई दिन तक कर्मचारी नहीं आते और फिर से कचरा बिखर जाता है। नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि राजधानी की अंबिकापुर से सात गुना ज्यादा आबादी है, लेकिन तमाम अमला होने के बावजूद यहां सफाई में सुधार नहीं दिख रहा। बता दें कि राजधानी में सफाई व्यवस्था पहले ठेकेदारों के हाथ में थी। इसमें सुधार के लिए पहले किवार कंपनी को ठेका दिया गया। इसके बाद रामकी कंपनी सफाई कर रही है। इसके बाद भी शहर की सफाई व्यवस्था बदहाल है।

 

सिर्फ कागजी प्रयोग करते रह गए
राजधानी का सरोना ट्रेंचिंग ग्राउंड कचरे का ढेर बनकर रह गया। नगर निगम की ओर से कागज पर कई प्रयोग किए गए, लेकिन धरातल पर नहीं उतर पाया। पिछले चार साल से दर्जनों योजनाएं बनाई जा चुकी हैं। कभी बिजली तो कभी खाद बनाने तो कभी कचरे के प्लास्टिक से सड़क बनाने की योजना भी बनाई गई। गीला और सूखा कचरा अलग-अलग नहीं हो पाने के कारण कोई भी योजना परवान नहीं चढ़ सकी। 

 

अब बिजली बनाने की बात, पर कैसे?
नगर निगम अब संकरी में कचरे से बिजली बनाने की बात कह रहा है, लेकिन शहर के कचरे में जब गीला और सूखा कचरा अलग ही नहीं तो कैसे बिजली बना पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। कंपोस्ट खाद के लिए पार्कों में बनाए गए पिट भी सूखे पड़े रहते हैं। इसमें निगम मुख्यालय का भी पार्क है, जहां पिट में कचरे का ढेर रहता है। इक्का दुक्का पार्कों को छोड़ दें तो शहर में कहीं भी खाद नहीं बना रहे।

 

इंदौर इसलिए नंबर-1
इंदौर में वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर इन चार सालों में काफी काम किया गया है। अब यहां प्लास्टिक के कचरे से डीजल बनाने की शुरुआत हो गई है। कचरा रीसाइकल होने के लिए रीसाइकल मशीनों तक पहुंच गया है। सोर्स पॉइंट से ही घरों और दुकानों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग कर लिया जाता है। कलेक्शन करने वाली गाड़ियां भी गीला और सूखा कचरा अलग रहे इसका ख्याल रखती है। सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर भी इंदौर शहर ने सफाई का बहुत ज्यादा ख्याल रखा है। जन सहभागिता भी बहुत ज्यादा है।

 

अंकों से समझिए शहरों का परफॉर्मेंस : 5000 अंकों में से
नंबर 01 इंदौर 4659

सर्विस लेवल प्रोग्रेस    1239 
सर्टिफिकेशन    1050 
प्रत्यक्ष जांच   1241 
सिटीजन फीडबैक     112


नंबर 02 अंबिकापुर 4394

सर्विस लेवल प्रोग्रेस  1194 
सर्टिफिकेशन    1050
प्रत्यक्ष जांच     1133
सिटीजन फीडबैक     1017

 

नंबर 41 रायपुर 3393

सर्विस लेवल प्रोग्रेस 1007
सर्टिफिकेशन 600
प्रत्यक्ष जांच  1073
सिटीजन फीडबैक   713

 

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