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रायपुर. समाज भले ही महिला और पुरुष के बीच भेद करता हो, लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगल वॉरफेयर कॉलेज में जेंडर आधारित फर्क देखने नहीं मिला। यहां नक्सलियों से मुकाबले के लिए महिला और पुरुष लड़ाकों को एक जैसी ट्रेनिंग दी जाती है। चाहे दहकते शोलों के ऊपर से छलांग लगानी हो या फिर ऊंचाई से कूदना हो, ट्रेनिंग का हर मॉड्यूल दोनों ही जेंडर के लिए समान है। इस कॉलेज में गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग काफी कठिन मानी जाती है। यहां तक कि एनएसजी कमांडो भी ट्रेनिंग के लिए इसी कॉलेज में आते हैं। यहां अब तक 470 महिला जवान ट्रेनिंग ले चुकी हैं, जो नक्सलियों को पीछे धकेल रही हैं।
कैडेट्स को ट्रेनिंग देने वाले बिग्रेडियर कहते हैं बंदूक से निकली गोली महिला और पुरुष में फर्क नहीं करती। इसीलिए, इसलिए ट्रेनिंग में भी अंतर नहीं किया जाना चाहिए। प्रेग्नेंसी के दौरान ऑपरेशन ड्यूटी करने वाली महिला कमांडो सुनैना पटेल भी इसी कॉलेज से प्रशिक्षण लेकर निकली हैं। सात महीने की प्रेग्नेंसी के बावजूद पहाड़ों और जंगलों के बीच नक्सलियों को चुनौती देना इन्होंने यहीं से सीखा है। बारसूर की रहने वाली सुनैना दंतेश्वरी फाइटर्स की टीम लीडर हैं, जो 30 लोगों की टीम को लीड करती हैं।
महिलाओं के सामने चुनौतियां
छत्तीसगढ़ में सामाजिक व्यवस्था और दूसरी वजहों से भी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। बालिका ड्रॉप आउट का प्रतिशत बेहद ऊंचा है। शिक्षा विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति लाख 14 से 18 साल की 5,419 छात्राएं स्कूल जाना छोड़ देती हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग की रिपोर्ट कहती है कि शहरों में 14 से 18 साल की लड़कियां फैक्ट्री, घर, दुकान या मॉल में काम करने लगती हैं। आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर इनके माता-पिता भी इसका समर्थन करते हैं। स्कूल से घर की दूरी, असुरक्षा और 18 साल से पहले शादी के चलते भी कई लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं।
छत्तीसगढ़ में महिलाओं की स्थिति
शिक्षा: 69 प्रतिशत लोग शिक्षित हैं।
स्वास्थ्य: प्रति हजार पुरुषों पर 977 महिलाएं हैं। प्रसूति के दौरान प्रति लाख 142 महिलाओं की मौत होती है, कुछ साल पहले तक यह आंकड़ा 171 था।
राजनीतिक भागीदारी: महिलाओं के लिए विधानसभा, नगरीय निकायों में 33 फीसदी और पंचायतों में 50 फीसदी आरक्षण का प्रावधान।
आर्थिक अवसर: स्पष्ट रिपोर्ट नहीं, पर यूएन ने माना कि महिलाएं देश की जीडीपी बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं।
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