एडिटर्स ग्राउंड रिपोर्ट / जातिगत समीकरण, स्थानीय-बाहरी का शोर, इधर मन ही मन सांसद चुनकर बैठा है खामोश मतदाता



caste equation, the noise of the local-outer
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caste equation, the noise of the local-outer
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शिव दुबे

शिव दुबे

Apr 16, 2019, 12:07 PM IST

झलप का बस स्टैंड। चाय की दुकान पर जब मैने लोगों से चर्चा शुरू की तो पहले तो लोगों ने उदासीनता दिखाई। पर जैसे-जैसे मैं चुनाव के कथित मुद्दों को उछालता रहा, वैसे-वैसे लोगों की रुचि बढ़ने लगी। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, चौकीदार से लेकर राफेल व एयर स्ट्राइक। सभी पर एक्सपर्ट कमेंट आने लगे। हां, लोगों को खुलता देखकर जैसे ही वोट डालने की बात पर आया, सभी ने एक प्रकार से चुप्पी साध ली।


पटेवा, बागबाहरा में भी कुछ इसी तरह का नजारा हुआ। महासमुंद में यही हाल। कुरूद और नगरी में भी चुनाव का एक सा माहौल। आम लोगों को मतलब नहीं और जब चुनावी ज्ञान की किताबें खुल जाए तो एक्सपर्ट्स की कमी नहीं। माहौल से बात इसलिए शुरू कर रहा हूं क्योंकि ऐसा पहली बार नजर आ रहा है कि लोकसभा चुनाव इतना नीरस सा हो रहा है। ऐसा लगता है कि वोट किसे देना है, इसका फैसला मतदाता कर चुका है। चुनाव प्रचार तो केवल प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों के लिए चुनाव प्रबंधन का एक हिस्सा भर है। महासमुंद लोकसभा क्षेत्र के लिए 18 अप्रैल को वोटिंग है और तीन दिन पहले भी चुनाव माहौल नदारद जैसा है।


मोदी और राहुल पर सिमटे चुनाव में मतदाताओं की तयशुदा खामोशी ने माहौल को फीका बना कर रख  दिया है। फिर भी महासमुंद लोकसभा में कांग्रेस के धनेंद्र साहू और भाजपा के चुन्नीलाल साहू के बीच सीधा मुकाबला है। भाजपा मोदी के सहारे विधानसभा चुनाव की हार का गणित कम करने का प्रयास कर रही है। वहीं कांग्रेस के पास राज्य सरकार के तीन महीने के काम हैं।  धनेंद्र अभी विधायक हैं और चुन्नीलाल पहले विधायक रह चुके हैं। 


इनके लिए दिल्ली का रास्ता तय करने के लिए जो मुद्दे उछल रहे हैं उनमें ये पांच मुद्दे अहम हैं :-

 

  • 16 लाख 32 हजार वोटर
  • 8.22 लाख पुरुष
  • 8.10 लाख महिलाएं
  • 2014 में भाजपा के चंदूलाल साहू ने अजीत जोगी को 1217 वोटों से हराया था।
  • 02 लाख 7 हजार 972 वोटों की मार्जिन से कांग्रेस ने जीत हासिल की है विधानसभा चुनाव में।

 

15 बार चुनाव हुए हैं अब तक

  • 11 बार कांग्रेस जीती
  • 04 बार भाजपा जीती
  • मोदी, मोदी और मोदी: चुनावी चर्चाओं में सबसे ज्यादा बात हो रही है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। कहा जा सकता है कि जो लोग बात कर रहे हैं वे या तो मोदी से प्रभावित हैं या फिर उनकी कार्यप्रणाली से नाराज। सर्जिकल, एयर स्ट्राइक हो या फिर केंद्र सरकार के काम। सभी तरफ मोदी ही मोदी हैं।
  • राहुल, राफेल और चौकीदार: कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का राफेल डील को लेकर मोदी पर किए गए हमले भी चर्चा में हैं। चौकीदार चोर है, जैसी बातों की चर्चा है। राहुल की राजनीति पर भी पॉजीटिव और निगेटिव बातें हो रही हैं। कांग्रेस लगातार इन्हीं बातों को प्रचारित भी कर रही है। उसकी कोशिश है कि मोदी और पुलवामा का प्रभाव जितना कम हो सके, उतना ही अच्छा होगा।

साहू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश : महासमुंद में भाजपा के चुन्नीलाल साहू और कांग्रेस के धनेंद्र साहू इस कोशिश में हैं कि साहू जाति के वोटरों का उनके पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाए। धनेंद्र साहू की तुलना में चुन्नीलाल इस मामले में ज्यादा आक्रामक होकर जुटे हुए हैं। वैसे महासमुंद में कुर्मी समाज के वोटर भी काफी संख्या में हैं। कांग्रेस कुर्मियों को सीएम भूपेश बघेल के नाम का हवाला देकर संगठित करने की कोशिश में है। यही वह खास वजह है जिसकी वजह से महासमुंद के चुनावी रण में एक नई बहस होने लगी है।

 

स्थानीय और बाहरी ऐसे : महासमुंद में दोनों दल के प्रत्याशी के लिए स्थानीय और बाहरी का मुद्दा भी है। चुन्नीलाल साहू के खल्लारी से होने के कारण भाजपा की ओर से जोरों पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस के धनेंद्र बाहरी हैं। धनेंद्र अभनपुर से विधायक हैं जो कि महासमुंद लोकसभा क्षेत्र में नहीं आता है। लिहाजा यह कितना प्रभावी मुद्दा बन पाया है, यह वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा।

 

बड़ी जीत और 100 दिन के काम : विधानसभा चुनाव परिणाम से यह लोकसभा चुनाव अलग नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस को मिली बड़ी जीत ही उसका सबसे बड़ा आधार बन गया है। महासमुंद लोकसभा की आठ में से पांच सीटें कांग्रेस के पास हैं। भाजपा के पास केवल तीन सीटें हैं। सरायपाली, बसना, खल्लारी, महासमुंद और राजिम में कांग्रेस का जबकि कुरूद, धमतरी और बिंद्रानवागढ़ में भाजपा का कब्जा है। इन सबसे  हटकर कर्जमाफी और राज्य की भूपेश सरकार द्वारा किए गए अब तक के कामों को कांग्रेस अपना आधार बना रही है। 

 

ऐसे जानें पिछले चुनावाें में सीट की तासीर

  • 1951 से 71 तक कांग्रेस की सीट रही। 1977 में आपातकाल विरोधी लहर में भारतीय लोक दल (जनता पार्टी) के ब्रिजलाल वर्मा जीते थे। सबसे ज्यादा 5 बार विद्याचरण शुक्ल जीते।
  • 1998 में भाजपा के चंद्रशेखर साहू ने पवन दीवान को हराया। एक साल बाद हुए चुनाव में श्यामाचरण शुक्ला जीते। 
  • 2004 में जब राज्य बनने के बाद पहली बार लोकसभा चुनाव हुए तब कांग्रेस से अजीत जोगी जीते। भाजपा से चुनाव लड़ रहे विद्याचरण शुक्ला हार गए थे। 
  • 2009 में भाजपा के चंदूलाल साहू ने कांग्रेस के मोतीलाल साहू को हराया था। 
  • 2014 में भाजपा के चंदूलाल साहू ने अजीत जोगी को 1217 वोटों से हराया।

2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 5 अाैर भाजपा 3 सीटें जीती है
 

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