डीबी ओरिजिनल / कहीं स्कूल मैदान में बना दिया स्टेडियम तो कहीं खेती शुरू हो गई, कई बन गए खंडहर

डोंगरगांव का मिनी स्टेडियम स्वीमिंग पूल बन गया है। ग्राउंड में बड़े-बड़े गड्ढे भी हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है। डोंगरगांव का मिनी स्टेडियम स्वीमिंग पूल बन गया है। ग्राउंड में बड़े-बड़े गड्ढे भी हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है।
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डोंगरगांव का मिनी स्टेडियम स्वीमिंग पूल बन गया है। ग्राउंड में बड़े-बड़े गड्ढे भी हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है।डोंगरगांव का मिनी स्टेडियम स्वीमिंग पूल बन गया है। ग्राउंड में बड़े-बड़े गड्ढे भी हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है।

  • किसी स्टेडियम में पवेलियन टाइप संरचना नहीं है, कहीं दीवारें नहीं हैं
  • एक तरफ सब चाहते हैं बच्चे खेलें, लेकिन ऐसे कैसे खेलेगा छत्तीसगढ़

दैनिक भास्कर

Dec 12, 2019, 11:59 PM IST

रायपुर. छत्तीसगढ़ के हर इलाके में मिनी स्टेडियम की हालत खराब है। कहीं अधूरे तो कहीं बदहाल। कोई स्कूल मैदान में बना दिए गए तो कोई खेत में। किसी स्टेडियम में पवेलियन टाइप संरचना नहीं है, कहीं दीवारें नहीं हैं और हैं भी तो छोटी। कहीं जिम नहीं बने तो कहीं इतने खराब कि कबाड़ हो गए।

सरपंचों की मर्जी के बिना ठेकेदारों ने बना दिए स्टेडियम

भास्कर टीम ने दर्जनभर मिनी स्टेडियम की पड़ताल में पाया कि सरपंचों की मर्जी के बिना ठेकेदारों ने स्टेडियम बना दिए, इसलिए उनके जाने के बाद ठेकेदारों ने भी इन्हें खंडहर बनने के लिए छोड़ दिया। नतीजा, इनमें से आधे मिनी स्टेडियम ऐसे हैं, जहां एकाध-दो बार खेल हुए होंगे। उसके बाद से सिलसिला बंद है क्योंकि अब वहां खेलने लायक हालत ही नहीं है। दरअसल, पिछली सरकार ने 4 साल पहले राज्यभर में 132 मिनी स्टेडियम मंजूर किए। ये ग्रामीण इलाकों के लिए थे, ताकि वहां खेलों को बढ़ावा मिल सके। 44 करोड़ रु. से ज्यादा में ये स्टेडियम मनरेगा के तहत बनाए जाने थे, ताकि गांवों में रोजगार भी मिले।

पैसे पूरे खर्च हो गए, सिर्फ स्टेडियम अधूरे हैं
मिनी स्टेडियम का फैसला होने के बाद शासन ने तय किया था कि सभी स्टेडियम दो हिस्सों में बनेंगे। पहला हिस्सा स्टेडियम की बिल्डिंग और बाउंड्रीवाल का था। यह टेंडर के जरिए ठेकेदार से करवाना था। हर स्टेडियम में इसके लिए 30 से 32 लाख रुपए मंजूर किए गए थे। इसी हिस्से में 3 से 5 लाख रुपए में ओपन जिम बनाना था। दूसरा हिस्सा मैदान को समतल करने का था। यह काम मनरेगा के तहत होना था। भास्कर की पड़ताल में पता चला कि बिल्डिंग, बाउंड्री और जिम का निर्माण तो हुअा लेकिन कहीं जगह गलत चुनी गई, कहीं मेंटेनेंस नहीं होने से सब कबाड़ हो रहा है तो कहीं बाउंड्री की हाइट कम कर दी गई। हाल ऐसा है कि भास्कर टीम जितने स्टेडियम में पहुंची, सभी जगह मिनी स्टेडियम की बाउंड्रीवाल की ऊंचाई अलग-अलग मिली। यही नहीं, आम लोगों के लिए बने शौचालयों की संख्या भी अलग-अलग थी।

ग्राउंड रिपोर्ट : जािनए मिनी स्टेडियमों की बदहाली का सच

स्टेडियम में ही स्कूल बनाया : मोहलई, दुर्ग
सांसद आदर्श ग्राम मोहलई में बड़ा खेल मैदान एक ही था। 2010 में स्कूल मंजूर हुआ तो सरपंच ने इसी मैदान के एक हिस्से में स्कूल भवन बनाने की अनुमति दी। यह बन गया, फिर मिनी स्टेडियम प्रोजेक्ट आ गया। जगह नहीं थी, इसलिए इसे स्कूल कैंपस में ही बनाना पड़ा। दिलचस्प बात ये है कि स्टेडियम मनरेगा में बना लेकिन पेमेंट नहीं हुआ। वहीं मैदान में गड्ढे हैं, इसलिए खेल नहीं हो पाया। सरपंच भरत निषाद ने बताया कि पेमेंट नहीं होने से समतलीकरण नहीं हुआ और गार्डनिंग भी नहीं की। मेंटेनेंस बंद है, इसलिए जिम भी कबाड़ हो गया है।

शराबियों का अड्डा : अंडा, धमतरी 
अंडा मिनी स्टेडियम में 2017 में भारतीय टेनिस बाल क्रिकेट संघ ने 25वीं जूनियर चैंपियनशिप के लिए राज्य की टीम के लिए ट्रायल लिया था। बालक एवं बालिका खिलाड़ियों का चयन इस स्टेडियम में ही हुआ, पर तब से खेलकूद का बड़ा इवेंट नहीं हुआ। गांव के कुछ बच्चे यहां खेलते हैं, लेकिन मैदान के भीतर तथा चारों और शराब की खाली बोतलें, दोना-पत्तल और खाली पाउच बताते हैं कि यहां कौन सा खेल चल रहा है। मेंटेनेंस के अभाव में ओपन जिम के उपकरण टूट चुके हैं। स्टेडियम जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है।

  • भाजपा सरकार के कार्यकाल में स्टेडियम के निर्माण और उसके स्थल चयन की अनेक खामियां सामने आ रही हैं। कहीं लापरवाही और कहीं गड़बड़ी है। अगर खेल विभाग के जिम्मेदार दोषी पाए गए तो सीधी कार्रवाई की जाएगी। अगर इनका निर्माण दूसरे विभागों ने किया है तो संबंधित विभाग को कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा। -उमेश पटेल, खेल मंत्री, छत्तीसगढ़

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