छत्तीसगढ़  / जात-पात की राजनीति फुटबाॅल के खेल के समान

Chhattisgarh Election: Caste politics is similar to football game
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Chhattisgarh Election: Caste politics is similar to football game

  • देश में जो ज्ञानी, चरित्रवान, योग्य हैं वहीं राजनीति से दूर, उनके चुने जाने की संभावना भी कम है
  • अतिवादियों व व्यवसायिक गुंडों की ताकत जाति, भाषा, अारक्षण को लेकर लोगों की कर रही हत्या

Oct 31, 2018, 10:44 AM IST

डॉ. अशोक पारख, अर्थशास्त्री। रायपुर. भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो सबसे योग्य, दूरदृष्टि, ज्ञानी तथा चरित्रवान हैं, वे राजनीति से दूर हैं। इस अंंधकारमय राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए उनके चुने जाने की संभावनाएं बहुत नगण्य हैं। इसका मूल कारण जात-पात की राजनीति है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जात-पात की राजनीति फुटबाॅल के खेल के समान है जो हमारे लोग जन-जीवन में खेलते हैं। 

 

जाति भारतीय समाज में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण घटक है। कुछ अपवादों को छोड़कर दुनिया के अधिकतर लोग अपने मां-बाप के धर्म का पालन करते हैं। वे न तो अपने मां-बाप का चुनाव करते हैं और न ही अपने धर्म का। भारत में जाति एक ऐसी संस्था है जिसका प्रभाव सामाजिक जीवन की सभी दशाओं पर पड़ता है।

 

जितने धर्म भारत में पैदा हुए हैं, कहीं और पैदा नहीं हुए। जन्म-मरण संबंधी अनेक परस्पर विरोधी विचार हैं। ऐसे रीति-रिवाज हैं, जो एक-दूसरे से भिन्न हैं। विचित्र लगते हैं। यह सब विविधता बिना किसी विवाद के सैकड़ों वर्षों से चल रहे हैं। ऐसा नहीं कि जाति-प्रथा को चुनौती नहीं दी गई। जातिविहीन समाज की कल्पना तो महात्मा गांधी ने भी की थी, लेकिन यह सब सामयिक रहा। 

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर हर प्रकार के जातिवाद का उन्मूलन करना चाहते थे पर आज ऐसा नहीं हो पाया। डॉ. राममनोहर लोहिया भी जातिगत भेदभाव के उन्मूलन के पक्ष में थे। समाज वैज्ञानिकों का मानना था कि जैसे-जैसे शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा जातिवाद समाप्त हो जाएगा। छत्तीसगढ़ की दोनों राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर की है। 

 

सचमुच यह विभाजन हमारे देश में महारोग के समान है। सांप्रदायिक घृणा, प्रादेशिकता की भावना, भाषायी उन्माद देश की एकता तथा अखंडता के मर्म को कुतर रही है। आज सभी दल आरक्षण की वकालत कर रहे हैं। अनुदान, नौकरी में आरक्षण, शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण के लिए नई-नई जातियां आगे आ रही हैं। 

 

अतिवादियों तथा व्यावसायिक गुंडों की बढ़ती ताकत जाति, वर्ग, भाषा, आरक्षण आदि को लेकर नागरिकों की हत्या करने में शर्म महसूस नहीं करती। इसे चुनौती देने की इच्छाशक्ति किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है। 

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