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चुनाव विश्लेषण / चुनाव में निरंतर बढ़ रहा धनबल-बाहुबल का प्रभाव, इसे रोकना होगा



छत्तीसगढ़ चुनाव : डमी फोटो छत्तीसगढ़ चुनाव : डमी फोटो
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छत्तीसगढ़ चुनाव : डमी फोटोछत्तीसगढ़ चुनाव : डमी फोटो

  • 1967 में उत्तर भारत के कई राज्यों में सौदेबाजियों के दौर के साथ सरकारें बनी थीं 
  • 90 के दशक में बाहुबलि खुद ही उम्मीदवार बनकर चुनाव मैदान में उतरने लगे

Dainik Bhaskar

Oct 14, 2018, 11:12 AM IST

डॉ. सुशील त्रिवेदी, पूर्व निर्वाचन आयुक्त। रायपुर. भारतीय राजनीति के साथ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति में 1967 के बाद धनबल और फिर बाहुबल का महत्व निर्णायक रूप से बढ़ता गया। पहले करोड़पति और बाहुबली उम्मीदवारों को जिताते थे, लेकिन 90 के दशक से ये स्वयं उम्मीदवार बनने लगे और जीतकर विधानसभा, लोकसभा में पहुंचने लगे। 

 

चुनाव लगातार ज्यादा खर्चीले और आपराधिक घटनाओं से भरे पूरे होने लगे, जिससे यह लगने लगा कि एक सामान्य राजनेता के लिए अपने कार्य और सिद्धांत के बल पर जीतना कठिन है। धनबल और बाहुबल का दुष्प्रभाव इतना बढ़ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को 90 के दशक में ही यह निर्णय देना पड़ा कि उम्मीदवार नामांकन के साथ अपनी संपत्ति और अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बाबत् शपथ पत्र दें। 

 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा है कि उम्मीदवार अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी बहुप्रसारित अखबारों में प्रकाशित कराएं। लेकिन करोड़पतियों और बाहुबलियों के विरुद्ध किए जाने वाले उपाय बेअसर सिद्ध हो रहे हैं और विधानसभा एवं लोकसभा में उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। जो लोकतंत्र के लिए एक गहन चिंता का विषय है।

 

1951-52 और 1957 के चुनाव मध्यप्रदेश में बड़ी सादगी और सैद्धांतिक नैतिकता के साथ होते रहे। बहरहाल, 1962 के चुनाव में राजनीति की शतरंजी चालें घातक रूप से चली जाने लगीं और टिकट दिलाने, पाने के लिए राजनीतिक दलों और विशेषकर कांग्रेस के भीतर, गुटबाजी होने लगी। किंतु तब भी चुनाव में धनबल या बाहुबल प्रभावी नहीं हुआ था। 

 

राजनीतिक पदों और मंत्रिमंडल में स्थान पाने के लिए भी कोई गलाकाट प्रतियोगिता 1962 तक गंभीरता के साथ नजर नहीं आती थी। इसके विपरीत 1967 के आम चुनाव में पहली बार धनबल की भूमिका नजर आई। कुछ उम्मीदवारों को निहित राजनीतिक स्वार्थों के द्वारा धनबल से समर्थन दिया गया था और बाद में भी मध्यप्रदेश में हुई विधायकों द्वारा दल-बदल करने की पहली घटना में धनबल का जोर दिखाई पड़ा था। 

 

लोकसभा-विधानसभा के लिए 1967 के आम चुनाव भारतीय राजनीति में नैतिकता के पराभव का संकेत देने वाले सिद्ध हुए हैं। इस चुनाव में देशभर में विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में कांग्रेस को वैसी सफलता नहीं मिली जैसी पहले मिलती रही थी। और इसी के साथ उत्तर भारत के कई राज्यों में राजनीतिक सौदेबाजियों के दौर के साथ सरकारें स्थापित हो गईं।

 

परिसीमन के कारण मध्यप्रदेश विधानसभा की 288 सीटें 1967 में बढ़कर 296 हो गईं थी। राजनीति में सत्ता हासिल करने की नीतिविहीन होड़ मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में 1967 में दिखाई दी। विधानसभा 1967 के चुनाव में कांग्रेस को 167 सीटें मिलीं। इस विधानसभा में जनसंघ का दबदबा 78 सीटों के साथ बढ़ गया था। 

 

साथ ही विद्रोही कांग्रेसियों की जन कांग्रेस, प्रजा समाजवादी पार्टी, हिंदू महासभा और निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ी संख्या में चुनकर आए थे। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र ने अपने रूखे व्यवहार से ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया को दुःखी और नाराज कर दिया था। मंत्रिमंडल में उचित स्थान न मिलने के कारण अनेक कांग्रेसी विधायक भी मिश्र जी से रुष्ट हो गए थे। 

 

कांग्रेस के 35 विधायकों ने दल बदल किया। दलबदलू कांग्रेसियों को जनसंघ, जन कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों का साथ मिला। कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई। इस राजनीतिक घटनाक्रम को अंजाम देने में ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया की सूझ-बूझ और विंध्यप्रदेश की वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गोविंद नारायण सिंह की राजनीतिक प्रबंधकीय क्षमता महत्वपूर्ण सिद्ध हुई थी।

 

इस दलबदल में छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेता शारदा चरण तिवारी की भूमिका रेखांकन योग्य थी। कुल मिलाकर धनबल-बाहुबल का यह खेल यूं ही आगे बढ़ता रहा, लेकिन इसे रोकना मुश्किल होता गया। इस तरह मध्यप्रदेश में जुलाई, 1967 में पहली बार गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी।

 

अलबत्ता, यह बेमेल गठबंधन ज्यादा नहीं चला और मार्च 1969 में गोविंद नारायण सिंह ने त्यागपत्र दे दिया। सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह, जो गोविंद नारायण सिंह के साथ हो गए थे, संयुक्त विधायक दल की सरकार के मुख्यमंत्री बन गए। सभी राजनीतिक पे्रक्षक यह मानते थे कि नरेशचंद्र सिंह सरकार नहीं चला पाएंगे। 

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