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धान के कटोरे की खुशबू फीकी

3 वर्ष पहले
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  • मोटे धान की कमाई के कारण छत्तीसगढ़ के महीन चावल का निर्यात हुआ बंद, कम कमाई और ज्यादा मेहनत के कारण सुगंधित धान से किसान दूर
  • सिर्फ दस साल में पैदावार दस लाख टन से घटकर ढाई लाख टन, पांच साल पहले तक पांच लाख टन निर्यात, अब एक दाना भी नहीं

असगर खान/ठाकुरराम यादव (रायपुर). छत्तीसगढ़ के खुशबूदार चावल की जिन किस्मों से पूरा देश ही नहीं विदेशों में भी हांडियां महकती थीं, सिर्फ दस साल में उसी सुगंधित धान की पैदावार हटकर एक चौथाई रह गई है। कम मेहनत में सरकारी समर्थन मूल्य के जरिए तगड़ा मुनाफा देने वाले मोटे धान की किस्में खेतों में छा गईं।

 

ज्यादा मेहनत और ज्यादा दिनों में पकने वाले सुगंधित धान की पैदावार इस बुरी तरह गिरी है कि दस साल में उत्पादन दस लाख टन से घटकर ढाई लाख टन ही रह गया। पांच साल पहले तक छत्तीसगढ़ से दुबराज, जंवाफूल, विष्णुभोग, जीरा फूल और तरुण भोग जैसे खास सुगंधित चावल का एक्सपोर्ट सालाना पांच लाख टन था। मोटे धान की खेती ने इसकी पैदावार इतनी कम कर दी कि निर्यात पूरी तरह खत्म हो गया।

 

नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ का गठन हुआ, तब यहां करीब दस लाख टन सुगंधित चावल की पैदावार होती थी। उसमें से करीब पांच लाख टन निर्यात होता था। अब तो कुल पैदावार ही मात्र ढाई लाख टन तक सिमट गई। यहां के चावल की मांग देश के प्रमुख शहरों के अलावा अमेरिका, दुबई, सऊदी अरब और इंग्लैंड में भी होती थी। यहां जितना चावल बन रहा है, उतना राज्य में ही खप जाता है। बाहर भेजने के लिए बचत ही नहीं है। पहले इंदौर भोपाल के पोहा उद्योग से लेकर उत्तर भारत के पुलाव में छत्तीसगढ़ का चावल विशेष महत्व रखता था। छत्तीसगढ में खेती करने वाले करीब 32 लाख किसानों के लिए सबसे बड़ा लालच यही होता है कि उनकी पैदावार की भरपूर कीमत मिले।

 

यहां की लगभग 80 फीसदी आबादी खेती पर ही निर्भर है। किसानों को धान की पूरी कीमत देने के लिए सरकार हर साल समर्थन मूल्य पर नवंबर से फरवरी तक धान खरीदती है। इस कारण किसान जैविक खेती के बजाए रसायनिक खाद के जरिये पैदावार बढ़ाने के लिए हाईब्रीड बीज का उपयोग अधिक करने लगे हैं। मोटा धान जल्द पककर तैयार हो जाता है। वजन अधिक होता है। पैदावार अधिक मिलती है।

 

23 हजार से ज्यादा किस्म छत्तीसगढ़ में
राज्य में चावल की 23 हजार से ज्यादा किस्में हैं। प्रदेश के कृषि विवि में इन किस्मों का जर्मप्लाज्म सुरक्षित रखा है। हालांकि ज्यादातर किस्में सिर्फ रिकार्ड के रूप में रखी गई हैं। छत्तीसगढ़ में लगभग दर्जनभर ऐसी किस्में हैं, जिनकी फसल ली जा रही है। इनमें मुख्य रूप से आईआर-54, आईआर-36, इंदिरा सोना, पूर्णिमा, समलेश्वरी, दंतेश्वरी, नरेंद्र, धान-97, एमटीयू-1010 शताब्दी और सहभागी धान प्रमुख हैं। इनमें लगभग सभी मोटे धान की श्रेणी में आते हैं।

 

दूसरे राज्य आगे निकल गए
इंदिरा गांधी कृषि विवि के प्रोफेसर डा. एके सरावगी के अनुसार दूसरे राज्यों ने एक्सपोर्ट क्वालिटी के चावल की पैदावार बढ़ाई है, जबकि हम ऐसा करने में असफल रहे हैं। इस कारण धीरे-धीरे हम बाजार से गायब होते चले गए। प्रीमियम राइस के दाने छोटे व मध्यम आकार के होते हैं। तरुण भोग, बादशाह भोग, दुबराज और विष्णु भोग छत्तीसगढ़ की खास किस्में हैं। कृषि विभाग उनके बीज में सुधार की कोशिश में लगा है।

 

रासायनिक खाद ने उड़ाई धान की खुशबू
धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र के किसान परदेशी साहू के अनुसार सुगंधित धान की फसल उन्हीं खेतों में अच्छी होती है, जिसमें रासायनिक खाद का उपयोग नहीं होता। इधर, अधिक पैदावार के लिए जिन खेतों में रासायनिक खाद का उपयोग किया जाता है उनमें अगर अच्छे धान की फसल लगा भी दी जाए तो उसमें भी खुशबू भी गायब हो जाती है। इसलिए धीरे-धीरे ज्यादातर किसानों ने मोटे धान की फसल को ही अपना लिया। दुर्ग जिले के जामगांव के किसान प्रहलाद यादव ने बताया कि अगर एक खेत में सुगंधित चावल लिया जा रहा है और वह किसान पूरी तरह उर्वरक खाद का प्रयोग कर रहा है लेकिन आसपास के खेत में रसायनिक खाद पानी के साथ उस खेत में भी पहुंच जाए तो चावल की खुशबू जाती रहती है। इसके लिए आसपास के चार-छह किसानों को एक साथ मिलकर खुशबूदार चावल की खेती करनी होगी।

 

नया प्रयोग

  • सामान्य चावल भी महकेगा: प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों ने धान में खुशबू फैलाने वाली जीन विकसित की है। अब तक चावल के खुशबूदार होने के पीछे जो कारक मानते जाते थे उनमें एसेटिलाइट और पायरोलिन प्रमुख है। इंदिरागांधी कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने इस मान्यता का तोड़ा है।
  • ऐसे खोजा गया जीन: कृषि वैज्ञानिकों को यहां सफलता तब मिली जब वे सबसे बेहतरीन सुगंधित चावल की खोज में लगे हुए थे। उसमें देश-दुनिया से सुगंधित चावलों की करीब साढ़े पांच सौ किस्मों को शामिल किया गया। इनमें छत्तीसगढ़ की भी करीब 76 प्रजातियां शामिल हैं।

 

रोचक तथ्य

  • बासमती चावल सबसे लंबा होता है। अच्छी किस्म की बासमती की लंबाई 7 एमएम होती है, वहीं पकने के बाद लंबाई 14 एमएम तक हो जाती है। देश-दुनिया में सुगंधित चावल की ऐसी किस्में भी हैं, जिनमें एरोटिलाइट दो पायरोलिन नहीं पाया जाता है। इनमें छग का तरुण भोग और बासमती भी शामिल है।
  • जिंक राइस-1 बढ़ाएगा दिमाग : प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़ जिंक राइस-1 नाम की चावल की एक नई किस्म विकसित की है, जिसके खाने से जिंक की कमी खत्म होगी। इस चावल को बच्चों के दिमाग के विकास के लिए उपयुक्त पाया गया है।
     
  सुगंधित चावल     हाईब्रीड चावल
लागत/ एकड़     18 से 20 हजार     20 से 22 हजार 
मुनाफा     42 हजार     60 हजार (चावल) 
समर्थन मूल्य     तय नहीं     1750 रुपए/क्विंटल 
पकने की अवधि     100 से 120 दिन     90 से 100 दिन 
जमीन की स्थिति     पहाड़ों की तराई     मैदानी भूमि


 

ये भी जानिए

  • 23450 प्रजातियां हैं धान की छत्तीसगढ़ में 
  • 1000 किस्में हैं सुगंधित चावल की दुनिया में
  • 150 किस्में हैं सुगंधित चावल की भारत में 
  • 06 किस्में हैं सुगंधित चावल की प्रदेश में 
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